वाराणसी का पुरावैभव

डॉ0 सुभाष चन्द्र यादव-

त्रैलोक्य न्यारी, भगवान शिव की प्यारी, विश्वविद्या की राजधानी “काशी” (वाराणसी) का धर्म, परम्परा, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में अति विशिष्ट स्थान है। भारतीय वांङमय काशी “आख्यान व महिमागान” से आप्लावित है। पुण्य सलिला, पतित-पावनी मॉ जान्हवी के सुरम्य तट पर विशिष्ट भौगोलिक अवस्थिति में भी काशी के महात्म्य वृद्धि में अप्रतिम योगदान किया है। इस सर्व प्राचीन जीवन्त नगरी ने न केवल एक विशिष्ट धार्मिक स्वरूप ग्रहण किया अपितु अनेक धार्मिक विचारों व सांस्कृतिक धाराओं की संगम स्थली भी बनी। वाराणसी एक शहर ही नही बल्कि स्वयं में सम्पूर्ण भारतीय सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि भी है। जिसका सम्यक् निदर्शन यहॉ के दैनिक जन-जीवन में भी प्रतिध्वनित होता है। वाराणसी की विशिष्टता का आधार केवल वांड्मय ही नहीं अपितु यहाँ की पुरासम्पदा भी है। जिसकी संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत लेख का अभीष्ट है। 

वाराणसी की पुरासम्पदा की जानकारी सर्वप्रथम 18 वीं शताब्दी के अन्तिम चतुर्थांस में तब हुई, जब भगवान बुद्ध की “धर्मचक्रप्रवर्तन” स्थली ‘सारनाथ’ से पाषाण खण्डों की खुदाई काशी नरेश के दीवान जगत सिंह ने करवाया । तब से प्रारम्भ कर अब तक अनेक विद्वानों ने इस विषय पर अनुसंधान कार्य किया ,परिणामतः वाराणसी का पुराव्यक्तित्व विराट से विराटतर  होता गया। इनका कालक्रम के अनुसार संक्षिप्त परिचय आगामी पृष्ठों पर प्रस्तुत है।

वाराणसी में पहड़ियॉ के पास स्थित “अकथा” ग्राम के पुरातात्विक उत्खनन से लगभग चौदहवीं शताब्दी ई0पू0 से पॉचवी शताब्दी ई0 तक के प्रमाण प्राप्त हुए है। वाराणसी के पुरातात्विक इतिहास में इसे प्राचीनतम् आवासीय साक्ष्य माना जा सकता है। वर्ष 2001 से 2009 के मध्य किये गये अनुसंधानात्मक उत्खनन से यहॉ अनेक सांस्कृतिक कालों के प्रमाण प्राप्त हुये हैं। सर्वप्रथम लगभग चौंदहवी शताब्दी ई0पू0 में प्रथमतः आबाद इस स्थल का अस्तित्व गुप्त काल, लगभग 5 वीं शती तक बना रहा। यहाँ से झोपड़ियों के अतिरिक्त, पकी इंZटों से निर्मित आवासीय साक्ष्य तथा दैनिक जीवन में प्रयुक्त सामग्रियाँ भी प्रभूत संख्या में प्राप्त हुई हैं। उल्लेखनीय है कि विश्वविख्यात बौद्ध स्थल सारनाथ यहाँ से मात्र दो से तीन किमी0 की तिर्यंक दूरी पर स्थित है। साधना व ज्ञान स्थली सारनाथ के भिक्षुओंं-उपासकों व ऋषियों की दैनिक आवश्यकता की आपूर्ति आसपास के ग्रामों से ही होती रही होगी। इस परिपेक्ष्य में अकथा एक महत्वपूर्ण केन्द्र माना जा सकता है।

काशी महाजनपद की राजधानी वाराणसी की पहचान आधुनिक राजघाट के समीप स्थित टीले से की गयी है। यहाँ के पुरातात्विक उत्खनन से लगभग 800 ई0पू0 से प्रारम्भ कर 1700 ई0 तक के प्रमाण प्राप्त हुये हैं। प्राप्त प्रमाणों में आवासीय संरचनाओं के साथ दैनिक जीवनोपयोगी सामग्री व मुद्रा छाप आदि प्रमुख है,जिन्हे सुदूरवर्ती क्षेत्रों से व्यापारिक सम्बन्धों का प्रमाण भी माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त यहाँ से प्राप्त अन्य सामग्रियां यथा-मृद्पात्र, लौह उपकरण, मुहरें, स्वर्ण मुद्रायें, गजदन्त की सामग्रियॉ, मृण्मूर्तियॉ आदि से प्राचीन शासन पद्धति व धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ संस्कृति के अन्य पक्षों पर भी व्यापक प्रकाश पड़ता है। राजघाट के ही समीप वरूणा के बायें तट पर स्थित सरायमोहाना के पुरातात्विक उत्खनन से भी प्राचीन वाराणसी के विविध पक्षों की जानकारी प्राप्त होती है। राजघाट के ही समकालीन साक्ष्य सरायमोहाना से भी प्राप्त हुये हैं। इसके विस्तृत अध्ययन से वाराणसी के ग्रामीण जीवन से नगरीय स्वरूप में परिवर्तन और विकास की प्रक्रिया पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है।

बौद्ध धर्म से सम्बन्धित व तथागत के पूर्व जन्मों की कथाओं पर आधारित जातक कथाओं में वाराणसी (काशी) का अनेकशः उल्लेख प्राप्त होता है। उन कथाओं में वर्णित समूहों के आवासीय साक्ष्यों व कर्मशालाओं की खोज भी सारनाथ के समीप स्थित आशापुर, कोटवॉ व तिलमापुर आदि ग्रामों के पुरातात्विक उत्खनन अनुसंधान के द्वारा की जा चुकी है। यहाँ से प्राप्त साक्ष्य न केवल धार्मिक साहित्य को वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं अपितु प्राचीन काशी के जन-जीवन की सजीव झाँकी भी प्रस्तुत करते हैं।

इसी के समानान्तर गंगा के दाहिने तट पर स्थित रामनगर के अनेक घाटों के पुरातात्विक अनुसंधान से प्राचीन वाराणसी के विस्तृत फलक की यथोचित जानकारी प्राप्त होती है। रामनगर से प्राप्त पुरावशेष लगभग 1000 ई0पू0 से प्रारम्भ कर 300 ई0 तक के माने गये हैं। इनके अध्ययन से प्रतीत होता है कि वाराणसी के नगरीय स्वरूप के निर्माण में आस-पास के स्थलों ने भी बहुविध सहयोग किया। उल्लेखनीय है कि रामनगर में स्थित काशी नरेश का किला वाराणसी की एक महत्वपूर्ण पुरासम्पदा है।

इसी क्रम में विश्व-विश्रुत “धर्मचक्र प्रवर्तन” स्थली सारनाथ (प्राचीन ऋशिपत्तन, मृगदाव/मृगदाय), वाराणसी के पुरावैभव का श्रेष्ठ अध्याय है। बोधगया में संबोधि प्राप्ति के उपरान्त गौतम बुद्ध ने सर्वप्रथम सारनाथ में ही ज्ञानोपदेश दिया था। यह बौद्ध धर्म की सबसे पवित्र स्थली है। मगध सम्राट अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भ, धर्मराजिका, धम्मेख स्तूप तथा कालान्तर में अन्य राजवंशों के सहयोग से निर्मित अनेक बिहार, मंदिर व लघु स्तूप यहाँ की पुरा धरोहर है। भारत का राष्ट्रीय चि यहीं से प्राप्त है। जो वर्तमान में सारनाथ संग्रहालय में प्रदर्शित है। कालान्तर में सारनाथ मूर्तिकला का विख्यात केन्द्र बना और यहाँ के शिल्प शास्त्र की स्वतंत्रशैली विकसित हुई। भगवान बुद्ध की धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में निर्मित विख्यात प्रतिमा इस शैली की सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाती है। इसके अतिरिक्त तृतीय शताब्दी ई0पू0 से प्रारम्भ कर लगभग 12 वीं शती ई0 तक सारनाथ में सांस्कृतिक गतिविधियॉ अनवरत होती रही, जिसकी जानकारी यहाँ से प्राप्त पुरावशेषों के माध्यम से होती है। यहाँ प्रभूत संख्या में पुरा सामग्रियाँ स्थलीय संग्रहालय में संग्रहीत व प्रदर्शित है।

सारनाथ ने केवल बौद्ध धर्मानुयायियों के आस्था का प्रधान केन्द्र है अपितु जैन व हिन्दू धर्मावलम्बियों के लिये भी इसका विशेष महत्व है। सारनाथ के समीप, सिंहपुर गॉव में 11 वें जैन तीर्थंकर श्रेयांशनाथ का जन्म होने के कारण जैनों का भी अति पवित्र तीर्थ है। सारनाथ नाम मृगों के नाथ अथवा महादेव के नाम पर पड़ा है जो शिव का एक उपनाम है। इस प्रकार सारनाथ एक धार्मिक मान्यताओं-विचारों की त्रिवेणी है और यहाँ स्थित धर्म राजिका स्तूप, धमेख, चौखण्डी स्तूप, मूलगंध कूटी विहार अनेक संघाराम मूर्तियाँ, प्रस्तर शिल्प, अभिलेख आदि के अध्ययन से सारनाथ के पुरावैभव की प्रतिती होती है।

वाराणसी के अन्य प्रसिद्ध पुरास्थलों में जनपद मुख्यालय से लगभग 10 किमी0 दूर स्थित कर्दमेश्वर महादेव मन्दिर है। कन्दवा ग्राम में पंचक्रोशी मार्ग का प्रथम पड़ाव होने के कारण यह स्थल अत्यन्त पवित्र और महत्वपूर्ण है। विशाल तालाब के पश्चिमी तट पर निर्मित पूर्वाभिमुख यह मन्दिर शिव को समर्पित है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। बलुआ पत्थर से निर्मित यह मन्दिर पंचरथ योजना पर बना है। वर्गाकार गर्भगृह, अन्तराल और आयताकार मण्डप तथा जगती, वेदी बन्ध, अन्तराल, कपोति, मण्डोवर, शिखर, आमलक और कलश इसके स्थापत्य की प्रमुख विशेषता है। मण्डोवर भाग पर आलों में अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ निर्मित की गयी है। उत्तर भारत की मंदिर स्थापत्य शैली की अन्तिम अवस्था का साक्षी इस मंदिर का निर्माण काल लगभग 12 शती ई0 माना जाता है। इस प्रकार वाराणसी का यह सर्व प्राचीन जीवन्त मंदिर, वाराणसी के पुरावैभव में अद्वितीय स्थान रखता है।

वाराणसी की पुरासम्पदा में मान महल का उल्लेख यहाँ समीचीन होगा। मुख्यतः मान मंदिर के नाम से विख्यात यह स्थल दशाश्वमेध घाट के पास स्थित है। मुगल राजपूत वास्तुकला के सुन्दरतम उदाहरणों में से एक यह स्थल गवाक्षयुक्त छज्जे तथा चित्रित वितान युक्त है। विशाल वेधशाला के लिये ख्यात इस महल का निर्माण अकबर के मुख्य अधिकारी आमेर नरेश मान सिंह द्वारा 1600 ई0 में करवाया गया था। परन्तु यहाँ पर वेधशाला का निर्माण लगभग 1737 ई0 के आस-पास जयपुर शहर के संस्थापक सवाई जय सिंह द्वितीय (1686-1745) ने करवाया जो स्वंय एक महान खगोलशास्त्री व राजा मान सिंह के वंशज थे।

मान महल के अन्दर वेधशाला निर्माण की योजना खगोल शास्त्री जगन्नाथ द्वारा तैयार की गयी थी, इसका निर्माण कार्य जयपुर के वास्तुकार सरदार मोहन सिंह द्वारा सदाशिव के निरीक्षण में किया गया था। इसका निर्माण समय की गणना करने, चन्द्र तथा सौर पचांग बनाने, इनकी गति तथा दूरी का अध्ययन करने,तारों एवं ग्रहों तथा अन्य आकाशीय पिण्डों के झुकाव का कारण ज्ञात करने के लिये किया गया था। सन् 1912 में जयपुर महाराज सवाई माधो सिंह के निर्देश पर तत्कालीन राजकीय खगोल शास्त्री पं0 गोकुल चन्द भुवन ने इस वेधशाला का जीर्णोद्धार कार्य किया। वाराणसी की पुरासम्पदा में यह एक अनमोल धरोहर है।

काशी को विश्व गुरू की उपाधि प्राप्त है। ऐसे में वाराणसी स्थित गुरूधाम मन्दिर का वर्णन अत्यन्त आवश्यक है। गुरूधाम मन्दिर की निर्माण योजना में भारतीय आध्यात्मिक साधना के स्वरूप को पूर्णतः अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया हैं। इस प्रकार के विशिष्ट निर्माण योजना के मन्दिर भारत में अत्यल्प है। आध्यात्म साधना का भाव प्रतीक यह मन्दिर स्वंय में अति विशिष्ट है। इस प्रकार के मन्दिर बाँसबेड़ियाँ का विख्यात “हंसेश्वरी मन्दिर”, दूसरा दक्षिण भारत में चिदम्बरम के निकटवर्ती भदलूर नामक स्थान में महात्मा रामलिंग स्वामीद्वारा प्रतिष्ठित “सत्यज्ञान सभा” नामक मन्दिर तथा झूसी स्थित “हंसतीर्थ” है।

गुरू आश्रय के बिना जीवन तत्वों की उपलब्धि प्राप्त करना असभंव है, गुरूलाभ के भिन्न-भिन्न साधन मार्ग है। अष्टकोणीय गुरूमूर्ति संवलित गुरूधाम मन्दिर के मूल में यही तत्व विद्यमान है। गुरूधाम का विस्तृत भू-क्षेत्र तीन भागों में विभक्त है। तीनों भाग पृथक रूप से एवं सामूहिक रूप से गुरूधाम नाम से निर्दिष्ट है। सर्वव्यापक रूप से प्राचीर विशिष्ट विस्तृत भू-क्षेत्र एक भाग है, उसके मध्यवर्ती एवं समग्र भू-क्षेत्र के केन्द्र स्थित गुरू मन्दिर दूसरा भाग, एवं इसी के सन्निहित समान्तराल रेखा में अवस्थित अन्तर्गृह से पृथक पादुका भवन तृतीय भाग, गुरूधाम कहने से इस सम्पूर्ण स्थान ही अभिहित होता है।

गुरूधाम मन्दिर वाराणसी कैण्ट से लगभग 8 किमी0 की दूरी, लंका मार्ग पर गुरूधाम चौराहे से लगभग 200 मी0 पश्चिमोत्तर दिशा में स्थित है। गुरूधाम मंदिर में प्रवेश पूर्वाभिमुख बहिर्द्वार से किया जाता था, जिसके दाहिने “नारायण कुण्ड” का उल्लेख प्राप्त होता है। सम्प्रति दोनों ही अतिक्रमण की भेंट चढ़ गये हैं। यहॉ से आगे बढ़ने पर मूल गुरू मन्दिर है। प्राचीर वेष्ठित यह अन्तर्गृह अष्टकोणीय हैं। आठों दिशाओं में भिन्न-भिन्न गठन व नाम के द्वार है यथा- पूर्वाभिमुख- काशीद्वार, उत्तर पूर्वाभिमुख- मथुराद्वार, उत्तरमुख- मायाद्वार, उत्तरपश्चिमाभिमुख- अयोध्याद्वार, पश्चिममुख-अवन्तीद्वार, पश्चिमदक्षिणभिमुख- पुरूशोत्तमद्वार, दक्षिणमुख-कॉचीद्वार तथा दक्षिणपूर्वाभिमुख- गुरूद्वार। प्रत्येक द्वार के ऊपर भिन्न-भिन्न चित्र प्रस्तर पर उत्कीर्ण है। इन सभी चित्रों में भिन्न-भिन्न भाव वैशिष्ट्य है। ये आठों द्वार- पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण दिशाओं एंव अग्नि, नैऋत्य, वायु, तथा ईशान् विदिशाओं के द्योतक है। प्राचीन परम्परा के अनुसार इन द्वारों का नामकरण किया गया है। मोक्षदायिनी सप्तपुरियों- अयोध्या, मथुरा, माया, कॉची, काशी, अवन्ती व पुरी के नाम से सात द्वार तथा विशिष्ट धारणानुसार गुरूनाम से भी एक द्वार निर्मित है।

मूल मन्दिर तिमंजिला व अष्टकोणीय है इसमें भू-तल पर चार द्वार है। मन्दिर के अन्दर अष्टकोणीय वेदिका के ऊपर सहस्त्रदल कमल और उसके ऊपर अष्टधातु निर्मित श्री गुरू तथा उनके बाम अंग में आसीन गुरू शक्ति मूर्ति सम्मिलित रूप से स्थापित थी। यह मन्दिर निःसंदेह गुरू मन्दिर है। प्रथम तल एवं द्वितीय तल भी अष्ट कोणीय है, जहाँ दीवारों के मध्य निर्मित संकरे सोपान पंक्ति से जाया जा सकता है। यह तीसरी मंजिल तक गयी है। इसमें भी चार दरवाजे हैं। प्रथम तल पर युगलमूर्ति प्रतिष्ठित थी जबकि द्वितीय तल रिक्त था जो महाशून्य का प्रतीक माना गया है। यहाँ से एक मार्ग पश्चिम दिशा में अवस्थित पादुका भवन में भी जाता है।

मूल मंदिर के पश्चिम में पादुका भवन अवस्थित है। मूल मन्दिर व पादुका भवन के अन्तराल में दोनों तरफ सात-सात लघु देवालय पंक्ति अवस्थित है। जो सप्त भूमि के प्रतीक माने गये हैं। जिसमें संभवतः अलग-अलग अभीष्ट मूर्तियॉ स्थापित थी। चार द्वार वाले पादुका भवन में पादुका स्थापना का विशेष महत्व है। इस भवन में गुरू की पादुका, गजदन्त निर्मित खड़ाऊ,सर्वोच्च आधार पर रखी गयी थी। देवता के पदचि अर्थात अष्टकोण-पाषाण खण्ड के ऊपर स्पष्ट रूप से अंकित राधा कृष्ण के युगल जोड़ी के शास्त्र विहित चरण-चिह्न उसके नीचे रखे गये हैं। निराकार गुरू का स्थान इस प्रतीक के माध्यम से सर्वोच्च दिखाया गया हैं ंं इस प्रकार सम्पूर्ण भारत वर्ष में तंत्र साधना का यह भाव प्रतीक मन्दिर विशेष उल्लेखनीय है।

काशी के कण-कण में शिव का वास है और काशी स्वयं में एक धरोहर है। यहाँ का प्रत्येक मंदिर, घाट और भवन का अपना वैशिष्ट्य है और सभी को एक स्थान पर संजोना दुष्कर कार्य है। फिर भी काशी के प्रतिनिघि पुरावैभव की संक्षिप्त प्रस्तुति से ही यहाँ की विशिष्टता, पवित्रता का आंकलन किया जा सकता है। जिसका सम्यक् निदर्शन उपर्युक्त पंक्तियों में किया गया है।

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(क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी)

क्षेत्रीय पुरातत्व इकाई, वाराणसी