काशी में निराला

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निराला जी का बनारस से बड़ा लगाव था। सुख और दुख, उभार और उतार-जीवन के हर मोड़ पर बनारस ने निराला को हृदय से लगाया। 1923-24 के दौर में छायावाद को प्रतिष्ठित करने वाले कवि के रूप में उन्हें ख्याति मिल रही थी। तब निराला कलकत्ता में ‘मतवाला’-मंडल के लेखकों के साथ काम कर रहे थे। तभी बाबू रामकृष्णदास मैथिलीशरण गुप्त के साथ उनसे कलकत्ता में मिले थे। निराला में उन्हें अपनी कविता पुस्तक ‘अनामिका’ दी और उन्हें अपनी कविताएं सुनाई। पहली ही मुलाकात में जो सम्बन्ध बना वह बाद में और दृढ़ हुआ। राम साहब ने शांतिप्रिय द्विवेदी के माध्यम से कई बार पत्र लिखवाकर अपने प्रकाशन से छापने के लिए कोई कविता पुस्तक देने का अनुरोध किया। उस समय निराला ने उन्हें कोई पुस्तक छापने को तो नहीं दी लेकिन बाद में वे बनारस आए और बनारस ऐसी स्थिति में आए जैसी स्थिति में आदमी घर के बाहर निकलने में भी संकोच अनुभव करे।

उग्र निराला को सोनागाही में एक घटिया जगह ले गए जहाँ निराला को भोग के बदले एक भयंकर रोग मिला। फोड़े और घाव के मारे उठना-बैठना तक दुश्वार। कोई पूछे तो  बताते न बने। निराला पहले शिवपूजन सहाय के पास ठहरे। फिर विनोद शंकर व्यास उन्हें जयशंकर प्रसाद के यहां से आए। गर्मी के दिनों में कमर में गमछा लपेटे बाकी उघारे बदन निराला को यहां के साहित्यिक वातावरण में हर जगह सहानुभूति मिली, सम्मान, प्यार मिला। प्रसाद जी ने न केवल अपने यहां रहने का प्रबंध किया बल्कि उनके इलाज का भी इन्तजाम किया। निराला को पैर लटका कर दाहिने हाथ के सहारे बैठे देखकर प्रसाद जी ने पालथी मारकर बैठने को कहा तो निराला बोले-जी नहीं बड़ा कष्ट है। सब फोड़े और घाव भर गया है। दो दिन में फिर कलकत्ता चले जाना है। प्रसाद जी ने पूछा-ऐसी हालत में आए क्यों? निराला ने कहा-कलकत्ते की भागीरथी वैसी पतित पावनी नहीं जैसी काशी की गंगा। सोचा, वहीं चलकर गंगा की धार में इस पाप को धो दूं। काशी के प्रति ऐसा भाव था निराला का।

बनारस में उनके चाहने वालों की कमी न थी। रामकृष्णदास, शांतिप्रिय द्विवेदी, वाचस्पति पाठक, कृष्णदेव प्रसाद गौड़, रामनाथ लाल ‘सुमन’, विनोद शंकर व्यास। इनमें से कई इनके प्रति श्रद्धा और आदर का भाव रखते थे, विनोद शंकर व्यास उनके लंगोटिया यार जैसे थे लेकिन जयशंकर प्रसाद निराला के लिए श्रद्धेय और सम्माननीय थे। शिवपूजन सहाय उनसे सच्ची सहानुभूति रखते थे। लेकिन हिन्दू विश्वविद्यालय में जो हिन्दी के आचार्य थे- श्यामसुन्दर दास, रामचंद्र शुक्ल, हरिऔध-इसमें से कोई न छायावाद को पसंद करता था न निराला को। निराला जब दूसरी बार 1928 में काशी आए तो नंददुलारे वाजपेयी ने हिंदी विभाग में उनका काव्य-पाठ आयोजित किया। श्यामसुंदर दास और रामचंद्र शुक्ल ने अध्यक्षता करने से मना कर दिया तो वाजपेयी जी ने हरिऔघ को राजी किया। कार्यक्रम में निराला अपने बनारस के चाहने वाले मित्रों के साथ बड़े-बड़े ठाट से पहुंचे। उनमें प्रसाद और रायसाहब मुख्य थे। निराला ने काव्यपाठ से पहले एक भाषण दिया जिसमें हिन्दी के अध्यापकों की ले-दे शुरू की। हरिऔघ जी बीच से उठकर चले गए। शेष कार्यक्रम वाजपेयी जी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।

निराला तीसरी बार बनारस आए जब बनारस से उनकी ‘गीतिका’ और ‘निरुपमा’ सरस्वती प्रेस से छप रही थी और प्रेमचन्द, भी आए थे। प्रेस की ऊपरी मंजिल पर वे प्रेमचंद से मिले तो पाया कि जैसे लखनऊ में देखा था उसकी तुलना में कमजोर हो गए थे। लखनऊ से एक्सरे कराकर प्रेमचंद लौटे तो निराला उनसे फिर मिले। उस यात्रा में निराला बनारस में गर्मियों से लेकर अक्टूबर में कुछ दिनों तक रहे। यहीं मैंथिलीशरण गुप्त की स्वर्ण जयंती में भाग लिया। अंतिम दिनों में प्रेमचंद जब रामकटोरा में ले जाये गए तब भी निराला उनसे मिले। देखकर निराला को लगा कि “सिंह को गोली भरपूर लग गई है।” उन्हीं दिनों निराला ने ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसी अमर कविता लिखी। निराला जब आखिरी बार उनसे मिले तो प्रेमचंद ने लेटे-लेटे हाथ जोड़कर कहा-अब तो अंतिम विदा है। निराला ने लौटकर एक लेख लिखा “द्विवेदी के गर्व और गौरव प्रेमचंद जी”। इस लेख में उनका दुःख, आक्रोश फूट पड़ा। 8 अक्टूबर को प्रेमचंद गए और 10 अक्टूबर के ‘भारत’ में ‘राम की शक्ति पूजा’ छपी। रामविलास शर्मा का विचार है कि इस कविता पर प्रेमचंद की दारूण मृत्यु की छाया है।

1939 में निराला बनारस चौथी बार आए-साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में रामचंद्र शुक्ल और निराला एक मंच से बोले। शुक्ल जी का छायावाद के प्रति विरोध कम और सहानुभूति अधिक परिलक्षित हुई। निराला ने भी उनके प्रति अपना सम्मान जलाने में संकोच नहीं किया। इस बार की निराला की काशी यात्रा सबसे अधिक सुखद थी। विनोद शंकर व्यास ने नौकाविहार का प्रबंध किया। गंगा पार रेती पर मित्रों के बीच निराला ने सस्वर गायन किया, कविताएं सुनाई। उस समय रूप नारायण पांडेय, अमृत लाल नागर, नरोत्तम नागर, ज्ञानचंद जैन के साथ गांधीजी के बेटे हीरालाल गांधी और बनारस के मित्र मौजूद थे। काश कि इस अवसर पर प्रेमचंद और प्रसाद भी रहे होते और उसकी फिल्म बनी होती।

दूसरे महायुद्ध के समय निराला की तबियत बहुत खराब हो गई। उनकी मानसिक अवस्था बिगड़ी रहने लगी। ऐसी ही दशा में निराला रामविलास शर्मा के छोटे भाई चौबे की शादी में बरात के साथ बनारस थोड़ी देर में आए और बरात के साथ ही लौट गए। इस पांचवी यात्रा में वे अमृत राय से मिलने गए थे।

1947 में नंददुलारे वाजपेयी ने बनारस में निराला की स्वर्णजयंती का आयोजन किया। वे गंगाधर शास्त्री के राष्ट्र भाषा विद्यालय में गायघाट पर ठहरे। यहीं रहते हुए रामचरित मानस के विनय खंड का खड़ी बोली में काव्यनुवाद किया। स्वामी विवेकानंद की तरह रेशमी साफा बांधकर रेशमी कुर्ते में निराला नागरी प्रचारिणी सभा के स्वागतमंच पर विराजमान हुए। वेदमंत्रों का गान हुआ, जानकी वल्लभ शास्त्री ने ‘वरदे वीणावादिनी वरदे’ का सस्वर गायन किया। लोगों की उपस्थिति बहुत कम थी। कवि सम्मेलन भी हुआ जिसमें दिनकर, सुभद्राकुमारी चौहान, शिवमंगल सिंह सुमन आदि ने कविताएं सुनाई। इस समारोह में पंतजी, महादेवी जी, माखनलाल चतुर्वेदी और मैथिलीशरण गुप्त की अनुपस्थिति खटकने वाली थी। शायद आयोजकों ने उन्हें विधिवत् बुलाया ही न था।

सातवीं और आखिरी बार निराला बनारस तब आए जब 1960 की वसंत पंचमी के अवसर पर गंगाधर शास्त्री के प्रयत्न से उनका जन्म दिन मनाया गया। यद्यपि निराला की मानसिक स्थिति ठीक न थी फिर भी सभा के अंत में उन्होंने बड़ा संतुलित वक्तव्य दिया और अपनी साहित्यिक (और जीवन) के अंत का संकेत भी दे दिया। उन्होंने अपने जीवन और साहित्यिक सेवा और उसकी उपेक्षा का सिंहावलोकन करते हुए ‘कहावत’ लोग मुझसे साहित्य की श्रीवृद्धि करने की आशा करते हैं लेकिन मुझसे अब अधिक आशा करना व्यर्थ है।”

निराला कलकत्ता, लखनऊ और इलाहाबाद की तरह बनारस में टिककर भले न रहे हों लेकिन वे यहां जब भी आए उन्हें आदर, सम्मान, प्रेम और सहानुभूति का उपहार मिला। प्रसाद जी उनके लिए बड़े भाई जैसे थे। प्रेमचंद श्रद्धेय। वरिष्ठ साहित्यकारों से लेकर युवा छात्रों तक ने उन्हें हाथों हाथ लिया। बच्चन सिंह ने उन पर पहली पुस्तक लिखी- “क्रांतिकारी कवि निराला।” गंगाधर शास्त्री ने “युगाराध्य निराला” नाम की पुस्तक लिखी। प्रगतिशील कवि त्रिलोचन के लिए तो वे रोलमॉडल ही थे। उन्होंने एक सॉनेट में लिखा है- “आंखों में रहे निराला/मानदंड मानव के तन के मन के/फिर भी पीस परिस्थितियों ने डाला।” वे बनारस के चलते-फिरते छोटे निराला जैसे ही दिखाई देते थे।