काशी में कबीर (मूलगादी पीठ कबीरचौरा मठ)

कबिरा खड़ा बाजार मे मांगै सबकी खैर ।
ना काहु से दोस्ती ना काहु से बैर ?

काशी के बाजारों के मध्य कबीर चौरा मुहल्ले में (पिपलानी कटरा के पास) कबीर मठ स्थापित है, जिसे मूलगादी पीठ भी कहा जाता है। कबीर दास का जन्म स्थान लहरतारा क्षेत्र (वर्तमान मे कबीर बाग) मे माना गया है, जहाँ इनकी जननी ने किसी कारणवश इन्हे लहरतारा तालाब के पास छोड़ दिया, वहाँ से नीरु व नीमा नामक जुलाहा दम्पत्ति इन्हे अपने निवास स्थान नीरू टीला पर ले आये और कबीर दास का पालन-पोषण किया। नीरु-नीमा का निवास स्थान ही वर्तमान मे कबीर मठ के रुप मेँ जाना जाता है। कबीर दास ने अपना अधिकांश जीवन यहीं व्यतीत किया था। तत्कालीन समय में लोक मानस में यह धारणा थी कि काशी मेँ प्राण त्यागने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है एवं मगहर में प्राण त्यागने से नर्क मे स्थान मिलता है। इस धारणा को अपवाद सिद्ध करने के लिये कबीर दास जीवन के अंतिम समय मे मगहर चले गये और वहीँ पर अपना प्राण त्याग दिया। मृत्यु के पश्चात जब उनके शव से चादर हटाया गया तो शव के स्थान पर कुछ पुष्प पड़े मिले, जिसमे से कुछ पुष्प का हिन्दुओ ने प्रतीक स्वरुप दाह संस्कार किया, जबकि मुसलमानो ने कुछ पुष्प को कब्र में दफनाया।

सन 1578 में इसी पुष्प के कुछ भाग को मठ में लाकर मठ के मध्य  मेँ कबीर दास के प्रतीक स्वरुप समाधि का निर्माण कराया गया। कबीर दास के शिष्य विद्वान पंडित सुरुति गोपाल ने कबीर पंथ की स्थापना की एवं पंथ के प्रथम आचार्य बने। सन 1933 में मालदा के सुखिया दासी तथा फिजी के महंत पिंगल दास, सुखराज दास, रुकमिन दास एवं उदित नारायन कबीरपंथियो ने वर्तमान समाधि स्थल का जिर्णोद्धार कराया था। मठ में ही गुम्बदाकार विशाल बीजक मन्दिर स्थापित है जहाँ कबीर दास साधना करते एवं उपदेश प्रदान करते थे। बीजक मन्दिर में कबीर दास की चरण पादुकाए माला (एक हजार आठ दानोँ की), टोपी, लकड़ी का घड़ा एवं एक त्रिशूल भी रखा हुआ है। त्रिशूल के सन्दर्भ में मान्यता है कि कबीर दास ने अपनी वाणी से किसी गोरखपंथी सन्यासी को पराजित किया था, जिससे प्रभावित होकर गोरखपंथी सन्यासी ने अपना त्रिशूल कबीर दास को भेंट स्वरूप प्रदान कर दिया। मठ परिसर के दीवारों पर कबीर दास से जुड़े किंवदंतियों को चित्रों के माध्यम से उकेरा गया है। विभिन्न सन्दर्भ़ों को आकर्षक आदमकद प्रतिमा के माध्यम से दर्शाया गया है प्रतिमा इतनी सजीव प्रतीत होती है कि मानों अपनी कहानी स्वयं बयां कर रही हों।

सन् 1934 में महात्मा गांधी का आगमन मठ में हुआ था, मठ में गांधी जी के दाण्डी स्वरूप की प्रतिमा स्थापित कर उस यादगार पल को संजोया गया है। कबीर चौरा मठ के पांचवें आचार्य द्वारा फारस से मंगायी गयी चक्की (पत्थर से निर्मित एवं कलात्मक) भी परिसर की शोभा को बढ़ा रही है।कबीर दास के पालक  माता-पिता नीरू-नीमा की समाधि एवं कई कबीरपंथी आचार्य़ों की समाधि भी परिसर में स्थित हैं, समाधियों का संगमरमर के पत्थरों से सुन्दर निर्माण कराया गया है। ज्येष्ठ पूर्णिमा से तीन दिवसीय कबीर जयंती का आयोजन प्रमुख रूप से किया जाता है, जिसमें देश-विदेश से लोगों का आगमन होता है। इस अवसर पर विभिन्न प्रदेशों से आने वाले कबीरपंथियों द्वारा अपने अलग – अलग अंदाज, राग-अनुराग के द्वारा कबीर दास के दोहों का गायन किया जाता है। गुरू पूर्णिमा के अवसर पर भी मठ परिसर में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता हैं। मठ प्रतिदिन सुबह छः बजे से रात आठ बजे तक खुला रहता है। मठ में प्रतिदिन सुबह एवं सायंकाल में प्रार्थना सभा होती है तथा नियमित रूप से सायंकाल में सामूहिक कबीरवाणी का पाठ किया जाता है। पाठ में सामान्य व्यक्तियों की भी सहभागिता होती है, व्यवस्थापकों द्वारा सामान्य व्यक्तियों के आगमन को सहज ही स्वीकार एवं सत्कार किया जाता है।

वर्तमान में मठ के आचार्य महंत श्री विवेक दास हैं, जिन्होंने सर्वसम्मति से सन 2000 में चौबीसवें आचार्य के रूप मे पद  ग्रहण किया था। मठ के प्रधान व्यवस्थापक गोपाल दास तथा देवशरण दास हैं। दान एवं किराये से प्राप्त धन से मठ की प्रबन्ध व्यवस्था की जाती है। मठ मेँ लगभग चालीस की संख्या में कबीरपंथी अनुयायी स्थायी निवास करते हैं। परिसर स्थित संत निवास मेँ परदेसी कबीरपंथी साधु-सन्यासियों के लिये निवास एवं भोजन की व्यवस्था मठ की ओर से निःशुल्क प्रदान की जाती है। मठ का अपना एक कबीरवाणी प्रकाशन है, जिसमें कबीर दास से जुड़े साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन किया जाता है। सन् 1980 में परिसर में कबीर पुस्तकालय की स्थापना की गयी, पुस्तकालय में कबीर सहित्य से सम्बन्धित पुस्तकें उपलब्ध रहती हैं। यहाँ सामान्य पाठकों के आगमन का भी स्वागत किया जाता है।

 

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