काशी में मेघदूत पर बने वर्षा चित्र

भारतीय कला साहित्य और संगीत में मेघ और वर्षा की पर्याप्त चर्चा हुई है। यहाँ प्राचीन संस्कृत साहित्य से लेकर समस्त आधुनिक साहित्य में सर्वत्र जीवन दायिनी मनोहारी वर्षा ऋतु के मेघ सौंदर्य की चर्चा खूब मिलती है। इसी प्रकार लोकसंगीत कजरी, बिरहा, ठुमरी टप्पा सहित शास्त्रीय संगीत की समस्त विधाओं में भी वर्षा और मेघ को प्रचुर रूप से विषय वस्तु बनाया गया है।

भारत कला भवन के संस्थापक स्व0 रायकृष्ण दास चित्र कला, साहित्य और संगीत के प्रकाण्ड ज्ञाता थे। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर स्थित, स्वस्थापित, भारत कला भवन में संग्रहीत अनेक महत्त्वपूर्ण वस्तुओं में प्राचीन कलाकृतियों के साथ ही, अपनी योजना के अनुसार भारतीय शैली के समकालीन विख्यात चित्रकारों द्वारा अनेक चित्रों का निर्माण कराकर, उन्हें कला भवन के संग्रह में शामिल किया। कला मनीषी रायकृष्ण दास की देख रेख में बनी इस प्रकार की कलाकृतियाँ आज भारतीय कला की श्रेष्ठतम् बानगी के रूप में इस उत्कृष्ट भारतीय संग्रहालय की अमूल्य नीधि का स्थान ले चुकी है।

भारतीय कला के पुनर्जागरण आन्दोलन के प्रणेता अवनीन्द्र नाथ ठाकुर की अगुआई में प्रारम्भ कला जागरण अभियान में रायकृष्ण दास स्वयं भी एक नायक के रूप में शामिल रहे। काशी में रहकर उन्होंने इस आन्दोलन को सशक्त विस्तार प्रदान किया। कला भवन में संग्रहित अनेक कृलाकृतियाँ उनके इस प्रकार के कार्य की सशक्त गवाह हैं। रायकृष्ण दास ने काशी में भारतीय कला पुनर्जागरण आन्दोलन को और सशक्त बनाने के लिए कलागुरू अवनीन्द्र नाथ ठाकुर से उनकी ‘कला मण्डली’ के प्रमुख कलाकार नन्दलाल बोस को काशी भेजने का आग्रह किया। वास्तव में रायकृष्ण दास की इच्छा थी शिल्पाचार्य नन्दलाल बोस के हाथों से काशी में कालीदास रचित मेघदूत के कथानकों पर आधारित बंगाल शैली में वर्षा चित्रों का निर्माण हो, जिन्हें कला भवन के संग्रहालय में संग्रहीत किया जा सके। कलागुरू अवनीन्द्र नाथ रायकृष्ण दास की कलात्मक सोच को पर्याप्त महत्व देते थे। वे राय साहब के इस सोच से पूरी तरह सहमत थे, लेकिन उनके लिए शिल्पचार्य नन्दलाल बोस को अधिक समय के लिए काशी में भेजना सम्भव नहीं दिखा। तब उन्होंने राय साहब की मांग के प्रत्युत्तर में एक अन्य कलाकार शैलेन्द्र नाथ डे को काशी भेजने की व्यवस्था किया।

राय कृष्णदास ने बंगाल शैली के इस सिद्ध कलाकार को हिमालय के पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा ऋतु में भुवाली, मसूरी और अन्य स्थानों पर ले जाकर इस क्षेत्र की वर्षा ऋतु में बादलों और बरसात से सम्बन्धित गतिविधियों का गहन अध्ययन कराया तथा उसके विषय में उन्हें दिशा-निर्देश प्रदान किया। वस्तुतः इस प्रकार दिशा निर्देश और हिमालय के वर्षाकालीन मौसम का अच्छी तरह परिचय देने के बाद रायकृष्ण दास ने शैलेन्द्र डे को महाकवि कालिदास की काव्य रचना मेघदूत में कल्पित मेघों से सम्बन्धित चित्रों के शृंखलाबद्ध चित्रण के लिए अच्छी तरह तैयार कर लिया। इस तैयारी प्रक्रिया के पूरी हो जाने पर राय साहब शैलेन्द्र डे को लेकर काशी आ गये। यहाँ भारत कला भवन में बैठाकर उनसे मेघदूत पर आधारित चित्रों की शृंखला का निर्माण कराया जिसमें काफी समय लगा।

भारत कला भवन में संग्रहीत महाकवि कालिदास द्वारा रचित मेघदूत के कथानक पर आधारित, बंगाल शैली के सशक्त कलाकार शैलेन्द्र डे के हाथों तथा रायकृष्ण दास के निर्देशित में बनी, ये विलक्षण कला कृतियाँ आज भारत कला भवन के समृद्ध संग्रहालय की उत्कृष्ट थाती होने के साथ ही भारतीय कला का उत्तम नमूना हैं। कलाकार शैलेन्द्र डे के हाथों बनी इन कलाकृतियों में महाकवि कालिदास द्वारा कल्पित मेघों का बनना बिगड़ना, उमड़ना घुमड़ना और फिर घनघोर रूप से बरसना पूरी तरह से साकार हो उठा है।

वास्तव में मेघदूत में वर्णित वर्षा एवं मेघ वर्णन में कवि हृदय रायकृष्ण दास के सक्षम निर्देशन एवं हिमालयी क्षेत्रों में कलाकार के द्वारा विषय वस्तु के प्रत्यक्ष दर्शन ने मिलकर मेघ वर्णन का जो सशक्त दृश्य उभारा है वह महाकवि कालिदास के काव्य को चित्र के रूप में दृश्य देने में बखूबी सक्षम है।

मेघदूत पर आधारित इस श्रेष्ठतम भारतीय कलाकृति श्रृंखला में कला मनीषी रायकृष्ण दास की चित्रकला और काव्य के समन्वय की उत्कृष्ट सोच के साथ ही सशक्त कलाकार की श्रेष्ठतम् तूलिका समायोजना का प्रभावकारी प्रगटीकरण हुआ है। वास्तव में महान कला निर्देशक रायकृष्ण दास के निर्देशन में बनी ये चित्र शृंखला संस्कृत साहित्य और भारतीय मूल के चित्रकला आन्दोलन से उपजी ‘बंगाल शैली’ के मेल का उत्कृष्ट नमूना हैं। भारतीय कला के अध्येताओं के लिए मेघदूत पर आधारित यह चित्रशृंखला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और उपयोगी सामग्री है जो रायकृष्ण दास के कलात्मक एवं काव्यात्मक दूर दृष्टि की श्रेष्ठतम उपज है।

                                                                                                                                                                                      मधु ज्योत्सना

 

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