जानिए काशी की अमूल्य धरोहर मानमंदिर वेधशाला को

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प्राचीनता, ऐतिहासिकता एवं नवीनता तीनों के अदभुत् मेल का नाम वाराणसी है। यहां के समृद्ध कालजयी इतिहास से जुड़ा है राजा-महाराजाओं का काशी प्रेम। काशी सभी को प्रभावित करती रही है। इसी वजह से समूचे भारत वर्ष से लोग यहां बरबस ही खिंचे चले आते रहे हैं। बात राजा-महाराजाओं की करें तो लगभग हर राजवंश के राजा ने काशी में कुछ समय व्यतीत ही नहीं किया बल्कि सदियों तक अपनी उपस्थिति इतिहास के पन्नों पर दर्ज कराने के लिए यहां बेजोड़ निर्माण भी कराया। इन निर्माण कार्य का उद्देश्य महज अपना नाम करना ही नहीं था बल्कि उसके जरिये बहुत सी समस्याओं को आसान करना भी प्राथमिकता थी। चाहे फिर यहां के विश्वप्रसिद्ध घाट हों या शानदार द्वार अथवा महल-हवेली सभी का अपना महत्व था। आज ये धरोहर हमारे बीच आकर्षण और कौतूहल का केन्द्र हैं। साथ ही हमारे पूर्वजों के समृद्ध कला, ज्ञान-विज्ञान का भान ये जीवंत इमारतें कराती हैं। यदि भारतवर्ष के मध्यकालीन इतिहास पर गौर करें तो जिस स्थान का सबसे गौरवशाली इतिहास रहा है वह राजस्थान ही है। यहां के राजाओं का काशी प्रेम इस पावन धरती पर कई अमूल्य धरोहरों का आधार बना। वाराणसी के इन्हीं बेहतरीन और बहुमूल्य धरोहर में से एक है मान सिंह वेधशाला। पारम्परिक ज्ञान के साथ यह वेधशाला हमें आधुनिक विज्ञान के एक आयाम यानी खगोलशास्त्र से भी परिचित करवाती है। यह ऐतिहासिक वेधशाला जीवनदायिनी मां गंगा के तट पर राजा मान सिंह के महल के ऊपर स्थित है। मान मंदिर नाम से प्रसिद्ध इस महल का निर्माण आमेर के राजा मान सिंह ने तकरीबन 1600 ई0 में कराया था। इस महल की खूबसूरती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसके झरोखे से काशी के सभी घाटों का नजारा लिया जा सकता है। इस  महल के भीतर की दीवारों पर की गयी कलाकारी भी नायाब है। इस आलीशान महल की खूबसूरती तब और बढ़ गयी जब जयपुर शहर को बसाने वाले महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1710 ई0 में इसकी छत पर प्रस्तर की वेधशाला का निर्माण कराया। वेधशाला को यदि सरल शब्दों में कहा जाये तो ग्रह नक्षत्र, वर्ष, समय और ज्योतिष की जानकारी लेने के लिए बनाया गया उपकरण। यह एक पारम्परिक भारतीय शास्त्र है, जिसकी सहायता से नक्षत्रों, कोणों और दिशाओं की गणना आसानी से होती थी। महाराज सवाई जय सिंह ने इस वेधशाला के निर्माण के लिए जयपुर से विशेषज्ञ मिस्त्री भागीरथ और राज ज्योतिषी पंडित गोकुल चन्द्र भावन को बुलाया था। राज ज्योतिषी की गणनाओं और निर्देशन में भागीरथ मिस्त्री के मिले-जुले प्रयास और अथक गणनाओं के बाद यह वेधशाला बनकर तैयार हुआ। राज ज्योतिषी और मिस्त्री का नाम घोषणा पत्र में लिखा हुआ है। इस बेहतरीन वेधशाला में चक्र यंत्र, नाड़ी यंत्र, दिगांश यंत्र, दक्षिणोत्तरभित्ति यंत्र शानदार हैं। जबकि यहां स्थित सम्राट यंत्र सबसे बड़ा और प्रभावी है। इस यंत्र के जरिये ग्रह नक्षत्रों के दिगांश की गणना की जाती है। वेधशाला की शान बढ़ा रहा नाड़ी वलय यंत्र गोल आकार में है। यह यंत्र दो दिशाओं दक्षिणा गोल एवं उत्तरा गोल में है। इस यंत्र के प्रयोग से सूर्य और ग्रहों की दिशाओं के बारे में जाना जाता है कि सूर्य दक्षिण दिशा में हैं या उत्तर की ओर साथ ही समय की भी जानकारी मिलती है। इस यंत्र की खास बात यह है कि सूर्योदय के बाद जब उसकी परछाईं इस पर पड़ती है तो यह यंत्र दिन का समय बताता है। यह यंत्र इतना सटीक बनाया गया है कि जब सूर्य उत्तर दिशा में रहते हैं तो उनकी परछाईं इस यंत्र के उत्तर गोल पर पड़ती है। इसे सूर्य घड़ी भी कहा जाता है। इसी तरह दक्षिण दिशा में रहने पर परछाईं दक्षिण गोल पर पड़ती है। दक्षिणोत्तरभित्ति यंत्र के जरिये मध्याह्न के ग्रहांश के बारे में पता लगाया जा सकता है। इसी तरह का एक यंत्र है जो नक्षत्रादि के स्पष्ट विषुवतकाल को बताता है। इस वेधशाला में अलग-अलग विषयों की जानकारी देने वाले आठ यंत्र हैं। ये यंत्र पूर्णिमा और गर्मी के मौसम में बेहद सटीक समय बताते हैं। हालांकि सर्दी में इनके समय बताने की गति कुछ तेज हो जाती है। इस महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कलाकृति को सन 1978 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने अपने अधीन कर लिया। लेकिन जैसा की हर सरकारी विभाग उदासीनता, निष्क्रियता रोग से पीड़ित है उससे इतर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की भी कहानी नहीं है। इस विभाग की उदासीनता और उपेक्षा का शिकार यह वेधशाला भी हो गया है। विभाग द्वारा हाशिये पर रखने की वजह से वेधशाला के कई यंत्र जीर्ण-शीर्ण हालत में हो गये हैं। कई यंत्रों की हालत तो इतनी खराब है कि उनके कई हिस्से टूट-फूट गये हैं, साथ ही कुछ हिस्से तो गायब हो गये हैं। बावजूद इसके न तो विभाग की ओर से खराब हो रहे यंत्रों का जीर्णोद्धार कराया जा रहा है और न ही बचे यंत्रों को सुरक्षित रखने के ही कोई समुचित उपाय किये जा रहे हैं। यदि पुरातत्व विभाग की कार्यप्रणाली इसी तरह रही तो जो बचे हुए यंत्र भी हैं उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। इस बेहतरीन वेधशाला को देखने के लिए भारतीयों से 5 और विदेशियों से 10 रूपये का टिकट लगता है। एक विडंबना और है अमूमन इस वेधशाला को देखने जाने वालों को यहां लगे यंत्रों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाती कि कौन सा यंत्र किस बारे में जानकारी देता है। क्योंकि विभाग की ओर से किसी प्रशिक्षित गाइड या कोई ऐसा सूचना पट्ट नहीं लगाया गया है जिसकी सहायता से यंत्रों के बारे में जानकारी मिल सके। यह ऐतिहासिक वेधशाला राजेन्द्र प्रसाद घाट के पास मानमंदिर घाट पर स्थित है।

-आनन्द पाण्डेय

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