माधव राव का धरहरा (धरहरा मस्जिद)

धार्मिक निर्माणों में भी कलात्मकता की नुमाइश न केवल श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है बल्कि एक अदभुत् सुकून भी देती है। यही वजह थी कि प्राचीन भारतीय काल से लेकर मध्यकालीन समय तक किसी भी निर्माण में उसकी मजबूती के अलावा खूबसूरती पर खास ध्यान दिया जाता था। आज भी ऐसी इमारतों का जब हम इस्तकबाल करते हैं तो बांछें खिल जाती हैं। शानदार इमारतें ऐसे दौर की यादों को ताजा कर देती हैं जब भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। समृद्ध संस्कृति, कला और परम्परा को अपने आप में समेटे हुए आज भी प्राचीन इमारतें खड़ी हैं। काशी में ऐतिहासिक भवनों की एक लम्बी श्रृंखला रही है। जो अलग-अलग कालखण्डों के राजा महाराजाओं यहां तक कि रानीयों द्वारा  बनवायी गयी।

ऐसे ही शानदार इमारतों में से है धरहरा मस्जिद। धार्मिक ईमारत होने के बाद भी इस मस्जिद का कलात्मक पक्ष बेजोड़ है। मुगल सल्तनत में बिल्कुल गंगा के किनारे निर्मित यह मस्जिद उस दौर के उत्कृष्ट कला का एहसास कराती है। इस मस्जिद को काशी के किसी भी गंगा घाट से देखा जा सकता है। मस्जिद के निर्माण में कलात्मकता पक्ष का विशेष ध्यान रखा गया है। धरहरा मस्जिद की दीवारों पर किये गये फूल पत्तियों के अलंकरण देखने में बेहद आकर्षक लगते हैं। वर्तमान में यह मस्जिद कुछ अधूरी है। क्योंकि इस मस्जिद की दो बहुत उंची मीनारें अब नहीं हैं। पहले के चित्रों और फोटोग्राफ में इन दोनों मीनारों को देखा जा सकता है। इन्हीं मीनारों के नाम पर इस मस्जिद का नाम धरहरा मस्जिद पड़ा है। अधूरी होने के बावजूद भी यह मस्जिद शानदार लगती है।

मस्जिद जहां पर बनवायी गयी है वहां पहले बिन्दु माधव का मंदिर था। मुस्लिम शासन के दौरान धार्मिक कट्टरता का प्रभाव काशी पर भी पड़ा। मुगल सम्राट औरंगजेब ने यहां कई मंदिरों को तोड़वाकर मस्जिदों का निर्माण कराया। धरहरा मस्जिद का निर्माण सन् 1669 ई0 में बिन्दु माधव के मंदिर को ध्वस्त करा कर उसकी जगह बेहद बड़े से चबूतरे पर किया गया। पंचगंगा घाट पर निर्मित इस मस्जिद से घाट की पहचान बन गयी है। पंचगंगा घाट पर बड़े से चबूतरे पर इस मस्जिद का निर्माण किया गया है। गली से मस्जिद की ओर जाने पर सीढ़ियों पर चढ़ने के बाद मुख्य प्रवेश द्वार है जो दो मेहराब के अलंकरण से शोभित है। प्रवेश द्वार से भीतर जाने पर सामने भव्य मस्जिद का दीदार होता है। हालांकि प्रवेश द्वार और मस्जिद में करीब 30 से 40 गज का फासला है। इस दूरी के मध्य में बना है एक छोटा सा तालाब जिसके बीच में लगा फौव्वारा बेहद खूबसूरत लगता है। इस तालाब का प्रयोग मस्जिद में आये श्रद्धालु वजु बनाने के लिए करते हैं।

तालाब के आगे एक उठा हुआ चबूतरा है जिस पर निर्मित है उपासना गृह। यह मस्जिद तीन भागों में बंटा है। मस्जिद का मध्य हाल बड़ा है जबकि उत्तरी और दक्षिणी हाल अपेक्षाकृत छोटे हैं। मस्जिद के इस तीनों हालों की खूबसूरती निहारते ही बनती है। पत्थरों पर की गयी नक्काशी अनुपम प्रतीत होती है। इन तीनों हालों का प्रवेश द्वार भी मेहराबदार है। इनके उपर कंगूरें और मीनारें बनी हुई हैं। वहीं, इस मस्जिद की शान दोनों मीनारें जो कि उत्तरी और दक्षिणी कोनों पर थीं वर्तमान में नहीं हैं। दरअसल, एक बार भूकम्प के तेज झटके में एक मीनार ढह गयी। जिससे दूसरी खड़ी मीनार देखने में अटपटी तो लग ही रही थी साथ में सुरक्षा की दृष्टि से भी खतरनाक थी। इसी को ध्यान में रखते हुए आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के निर्देश पर दूसरी मीनार को भी उतरवा दिया गया।

मस्जिद के तीनों हालों के ऊपर गुम्बद बने हुए हैं। इन गुम्बदों के निर्माण में स्थापत्य कला का नायाब नमूना इस्तेमाल किया गया है। जिसकी वजह से ये गुम्बद जैसा बाहर से देखने में लगते हैं वैसे ही मस्जिद के भीतर से भी दिखाई देते हैं। मस्जिद के हर हिस्से को उत्कृष्ट बनाने का पूरा प्रयास किया गया है। मस्जिद में बने दोनों गुम्बदों के बीच खाली स्थान है। एक समानान्तर स्थान होने के कारण गुम्बद की खूबसूरती और बढ़ जाती है। मस्जिद के भीतर के तीनों हाल मेहराबदार प्रवेश पथ से जुड़े हुए हैं। मुख्य हाल के दीवार पर मेहराब बना हुआ है। मस्जिद के छत पर पश्चिम दिशा में दो छतरियां बनी है।  जिससे इस मस्जिद की खूबसूरती और बढ़ जाती है। गंगा किनारे बने घाटों के बीच यह मस्जिद अपनी खास पहचान रखती है।

-आनन्द पाण्डेय

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