मछली बंदर मठ वाराणसी

मंदिर मठों की नगरी के रूप में प्रचलित काशी में मठों की अपनी एक परम्परा एवं ऐतिहासिकता रही है। वाराणसी के मठों में मछली बंदर मठ का अपना महत्व रहा है। यह मठ जितना प्रचीन है उतना ही ऐतिहासिक भी है। इस मठ की पूरे देश भर में कई स्थानों पर शाखायें हैं लेकिन प्रधान गद्दी काशी में है। मान्यता के अनुसार इस मठ का नाम मछली बंदर इसलिए पड़ा कि जब इस मठ की स्थापना की गयी उस समय इस स्थान पर जंगल था जिसमें काफी संख्या में बंदर रहते थे वहीं मठ के सामने गंगा और बगल में अस्सी नदी बहती थी। जिसकी वजह से इसका नाम मछली बंदर मठ पड़ा। इस मठ में रहने वाले सभी संत दण्डी सन्यासी होते हैं। कहा जाता है कि यह मठ बहुत प्राचीन है। इस मठ से जाने-माने संतों का सम्बंध रहा है। मठ के भीतर ही एक मंदिर है। इस मठ का परिसर बहुत बड़ा है। मठ में एक बहुत बड़ी सी यज्ञशाला भी है। साथ ही इस मठ में गो सेवा भी की जाती है। मठ में काफी संख्या में गायें हैं। यह मठ अस्सी घाट से नगवां की ओर बढ़ने पर दाहिनी ओर स्थित है। मठ की ओर से समय-समय पर यज्ञ अनुष्ठान आयोजित किये जाते हैं। वहीं, गुरू पूर्णिमा के अवसर पर संत सम्मेलन, यज्ञ एवं भण्डारे का आयोजन किया जाता है। यह मठ एक सिद्ध तंत्र पीठ भी है। वर्तमान में इसके महंत दण्डी स्वामी विमल देव महराज जी हैं।

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