काशी की भित्ति चित्रकला: एक लुप्त होती विरासत

त्रैलोक्य से न्यारी शिव की नगरी काशी, जहाँ भगवान बुद्ध, तुलसी दास, कबीर दास, रविदास, अघोर संत कीनाराम, महामना मालवीय जी, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, मुंशी प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, भारत रत्न पं0 रविशंकर, उस्ताद बिस्मिल्ला खां, पं0 किशन महाराज, संगीत मार्तण्ड पं0 ओंकारनाथ ठाकुर, नृत्य सम्राट गोपीकृष्ण, बजरंगी लाल यादव, प्यारेलाल प्रजापति, कालिदास प्रजापति जैसी दैवी चेतना ने मानवीय रूप लेकर इस नगरी को अपनी कर्मस्थली, तपस्थली बनाया। प्राचीन काल से ही लोककला, गौरवशाली और अक्षुण्ण भारतीय संस्कृति से समृद्ध, देवों की इस पवित्र नगरी, काशी के छोर-छोर और पोर-पोर में व्याप्त है। ‘कला और संस्कृति का इतना घनिष्ठ संबंध है कि उन्हें एक दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता।’1 वर्तमान समय में विश्व में सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली इस नगरी में जन-जन के मन से जुड़ने वाली लोक कलाओं के पारखी प्रतिभाओं का हनन हो रहा है, साथ ही उनके द्वारा प्रवाहित लोक कला धारा का मार्ग अवरुद्ध हो रहा है, इस कारण काशी की निर्मल लोक कला का अस्तित्व आधुनिकता की धुंध में विलीन होता जा रहा है।

धार्मिक पौराणिक आस्थाओं की चित्रमयता, जो भारतीय जन मानस का शक्ति संसार है, लोक कलाओं में साकार होता है। ‘हमारी इस लोककला को परंपरा से आगे बढ़ाने का कार्य ग्रामीण जनता ने किया है। उसने अपनी प्राचीन संस्कृति और कला की विरासत को जीवनदान देकर एक ओर तो प्रभुत्त्वशाली वर्ग की दासता से उसकी रक्षा की और दूसरी ओर इसमें इतनी जीवन शक्ति भरी कि वह विश्व कला की प्रगतिशील भावधारा के साथ आगे बढ़ सके।’2 काशी के जीवन में निर्धन से निर्धन व्यक्ति की झोपड़ी में भी गोबर से गणेश बनते हैं अर्थात् यहाँ के लोक जीवन में कला अलंकरण न होकर अंतःकरण बन जाती है। छः ऋतुओं के चक्र में द्वादश मास की वर्ष यात्रा मानवीय तथा दैवीय लीलाओं की गतिविधियों को अवतार देती रहती है। ‘गुन न हिरानो, गुन ग्राहक हिरानो है’, अर्थात् इस नगरी के किसी भी कोने में प्रतिभा सुप्तावस्था में खोजने पर मिल जाएगी। ‘लोकगीत, लोकचित्र, लोकनृत्य, लोक अभिनय और लोक चर्चाएं आदि सभी कला प्रणाली से उद्भूत हैं।’3 संकट उस प्रतिभा की पहचान का है, उसके संरक्षण का है, जिसके अभाव में लोक कलाओं से जुड़ी प्रतिभाएं जीविकोपार्जन हेतु अपनी कला से दूर हो रही हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी अनेक प्रकार के अवरोधों और सामाजिक व्याघातों को आत्मसात् करते हुए, काशी के लोक कलाकार (चित्रकार, शिल्पकार आदि) अपनी पारम्परिक कला को बड़े यत्नपूर्वक सहेजे हुए हैं। परन्तु समय परिवर्तन के साथ कला साधकों की यह साधना अधिक दुविधापूर्ण होती जा रही है। पूर्व में मांगलिक कार्यों (विवाह, उपनयन, यज्ञोपवीत, जन्मोत्सव आदि) पारंपरिक लोक उत्सवों में प्रत्येक परिवार के गृहस्वामी द्वारा अपने घर की दीवारों पर तथा द्वार पर शुभ प्रतीक के रूप में लोक कलाकारों द्वारा लोककला का चित्रण कराना पारिवारिक उत्सवों का अभिन्न अंग था, जो अपने आप में वर्षों की अटूट भावमूलक संस्कृति का वहन करता था।

इन भित्ति चित्रों में सर्वप्रथम गणेश का अंकन होता है। कभी गणेश अकेले बैठे हुए तो कभी इनके दोनों ओर ऋद्धि-सिद्धि दो देवियों का चंवर डुलाते हुए चित्र होता है। कहीं-कहीं अकेले सिंहासन पर विराजे हुए गणेश जी के दोनों ओर मछलियों का चित्र होता है। मंगलकरण श्री गणेश का चित्र कभी पूजाघर की दीवारों पर या मुख्य द्वार के ठीक ऊपर चित्रित किया जाता था। काशी की दीवारों पर द्वारपाल का भी बहुत अधिक चित्रण हुआ है। मुख्य दरवाजे के दोनों ओर द्वारपाल का चित्रण होता था। बहुदा पगड़ी, घेरदार पजामा और चुड़ीदार पजामा में इनका चित्रण अधिक किया जाता था। हाथों में तलवार या मूठदार दण्ड होता है राजा-महाराजाओं के राजशाही वंशों की समाप्ति के पश्चात्, सामाजिक व सांस्कृतिक परिवर्तनों के फलस्वरूप कला में भी परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। बाद के समय में द्वारपाल का बंदूक लिए हुए वर्दीधारी सिपाही के रूप में भी चित्रण हुआ है। आज भी बनारस की संकरी गलियों में यहाँ-वहाँ, पुराने मकानों की दीवारों पर द्वारपालों के चित्र दिखाई पड़ जाते हैं। कहीं-कहीं, विशेशतः मंदिर की दीवारों पर रक्षक के रूप में संकटमोचन हनुमान का चित्रण भी किया जाता था। हनुमान मंदिर के दोनों ओर गदाधारी पहलवान आदि प्रासंगिक प्रतीकों का चित्रण लोक कलाकारों की निपुणता का सबल प्रमाण था। बनारस के गायघाट मोहल्ले के प्रेमचंन्द्र पाण्डेय जी के घर में हनुमान जी का एक प्राचीन चित्र (टेम्परा में) है जो उनके पास कई पीढ़ियों से है। वे उसको इष्ट देव के रूप में पूजते हैं।  इनके अलावा घरों के द्वार पर एक तरफ हाथी और एक तरफ घोड़ा भी बनाए जाते थे। हाथी पर हौदों, झूल व अनेक अलंकरणों की सजावट होती थी। महावत तुर्रेदार पगड़ी बांधे, जामा पहने तथा कमर में साफा बांधे रहता है। हाथी पर राजा की सवारी होती है। गणेश के प्रतीक के रूप में सबसे पहले दरवाजों पर हाथी की पूजा की जाती थी। इसके अलावा ऊँट, खरगोश, बाघ व हिरन, तोता, नारी के विभिन्न रूप, मंगलकलश, केले का वृक्ष तथा अन्य फूल, लता-वल्लरियों, पत्तियों और पौराणिक व धार्मिक कथाएं भी भित्तिचित्रण के रूप में साकार होकर दीवारों की सुंदरता में चार चाँद लगाते थे। छोटे-छोटे मंदिरों (स्थान देवता, ग्राम देवता-लोक देवता, बीर, देव, शिवालय, व्यायामशालाओं के हनुमान जी) की शोभा भी इन्हीं भित्ति चित्रों के माध्यम से ही संवरती थी और निखरती थी। मिट्टी के मंगल कलश एवं दिये, जिन्हें कुम्हार के हाथों ने रचा और किसान के पसीने ने कपास (रूई) की बाती दी, वे भी घरों तक पहुँचने से पहले लोक कलाकारों की उंगलियों से सजते और संवरते थे। चटकीले रंगों से रंगे भांति-भांति के अलंकरण इन मिट्टी के छोटे-छोटे आकारों सजीव और साकार कर देते थे।

परन्तु आधुनिक व्यवसायीकरण के युग में इसी कला से जुड़ी कृतियाँ नवधनिकों के अतिथिकक्ष की शोभा बन गईं, जिसका लाभ मात्र बिचौलियों को ही प्राप्त हुआ। समाजिक सारोकार के संदर्भ में जन-जीवन ने अब इस कला को पुराना फैशन मानते हुए, पुराने वस्त्रों की भांति ही छोड़ दिया। जो चित्र परिवार की धार्मिक आस्था एवं उल्लास, उमंग, प्रसंग के भावाभिव्यक्ति का माध्यम थे उनकी जगह विदेशी झालरों, आधुनिक पाण्डालों (टैन्ट) तथा यांत्रिक प्रतिकृतियों ने लिया। आज वर्तमान में तकनीकी के अतिशय विकास के काल में दृश्य-श्रव्य माध्यमों का सृजन, रूपान्तरण, सम्प्रेषण, संचार सभी कुछ, कुछ पलों में ही संभव हो जाता है। विकास की तीव्र गति में संवेदनाओं की धीमी परंतु मार्मिक रंगयात्रा इन लोक कलाकारों के हृदय तक ही अवरुद्ध हो गई है। दूसरी ओर आधुनिकता की अंधी दौड़ में मंहगाई की तीव्र मार से लोक कलाकार को चित्रकला के लिए कूंची-रंगादि जुटाना तो कठिन हुआ ही है, साथ ही वो अपने जीवन-यापन और उदर पूर्ति के उद्देश्य से दो वक्त के भोजन की व्यवस्था करने को मोहताज है। ‘उस्ताद मूलचंद के अंतिम समय में चित्रों की मांग बहुत कम हो गई थी। परेशान होकर इन्होंने तम्बाकू की दुकान खोल ली थी।’4 प्रसिद्ध आलोचक व लेखक डॉ0 एच.एन. मिश्र द्वारा बनारस के ही एक प्रसिद्ध भित्तिचित्रकार बजरंगी लाल यादव से यह प्रश्न करने पर कि क्या उनका लड़का भी यही चित्रकारी का काम करेगा ? इस पर चित्रकार बजरंगी का उत्तर था, “नहीं, बिल्कुल नहीं…..वह दूसरी नौकरी करेगा। इसमें अब पहले जैसी आमदनी नहीं होती। लोग अब बहुत कम चित्र बनवाते हैं। शादी-ब्याह पर चित्र बनवाते हैं और पैसा देने में भी आनाकानी करते हैं। कई बार उनके घर दौड़ना पड़ता है।…….हमारे पिताजी बहुत अच्छे कारीगर थे। हम नालायक निकले, उनसे कुछ नहीं सीखा। हमारा लड़का तो यह काम बिल्कुल करना नहीं चाहता।”5 स्पष्ट है कि जन सामान्य में अब इस तरह के कार्य कराना समय और धन की बर्बादी समझा जाने लगा है। इससे कलाकारों के मन में निरुत्साह बढ़ा है और लोक कला के प्रति लोगो में मन में अरुचि उत्पन्न हुई है। एक और उदाहरण लें, ‘उस्ताद रामप्रसाद जी को अपनी अभिव्यक्ति और पहचान का उपयुक्त मार्ग नहीं मिलता था। पेट भरने के लिए उन्हें मामूली तैलचित्र, शबीहें, प्रतिकृतियाँ आदि बनानी पड़ती, फिर भी उन्होंने आधुनिक प्रवृत्तियों को अपनाया।’6 समाज एवं शासन की उपेक्षा एवं विस्मृति ने इन कलाकारों को अप्रासंगिक, अनुपयोगी होने का कृत्रिम बोध करा दिया है जो दुर्भाग्यपूर्ण है। विकास के साथ-साथ ही आधुनिक संसाधनों को अपनाना आवश्यक है, परन्तु अपनी विरासत, संस्कृति, लोक कलाओं का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। ‘लोककला परम्पराप्राप्त कला का ऐसा महत्त्वपूर्ण रूप है जिसकी उपेक्षा गँवारू कला कहकर नहीं की जा सकती।’7 साहित्य, संगीत, कला ही मनुष्य को सामाजिक बनाती है। आधुनिक उन्नति के साथ ही समाज को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए अपनी लोक कलाओं का संरक्षण, संवर्द्धन भी अनिवार्य है जो सभी का दायित्व है।

कला का संरक्षण तभी हो सकता है जब कलाकार को पर्याप्त संरक्षण मिले। उचित मंच, अवसर, माध्यम प्रदान करते हुए समाज की मुख्य धारा में आर्थिक रूप से निर्बल, अनाम, लोक कलाकारों को सम्मिलित करते हुए उनके अनुकूल अपेक्षित सम्मान, महत्त्व, प्रचार-प्रसार एवं आर्थिक संरक्षण प्रदान किया जाए। विविध लोक संस्कृतियों से सजी भारतीय सभ्यता के प्रत्येक क्षेत्र को अपनी मौलिक, विशिष्ट प्रतीकात्मक लोक शैली होती है (गीत, संगीत, चित्र, वेशभूषा, साहित्य आदि), कालक्रम के साथ इनका संरक्षण आवश्यक है, तभी भारतीय संस्कृति की मूल विशेषता ‘अनेकता में एकता’ चरितार्थ होगी।

उद्देश्य-

इसी परिप्रेक्ष्य में चलन से दूर होती जा रही काशी की भित्तिचित्र परंपरा से जुड़े कलाकारों से संपर्क, उनके वर्तमान परिवेश का शोध तथा उनसे वैचारिक स्तर पर सामीप्य, उनकी कृतियों की समीक्षा एवं महत्त्व का समांकलन करते हुए उनकी सृजनधर्मिता की प्रासंगिकता को सिद्ध करना, समाज के उच्च शिक्षित वर्ग से उनको परिचित कराना भी, लोक कलाकारों के संरक्षण के द्वारा लोक शैली का संरक्षण संभव हो सकेगा।

उपरोक्त सभी विचार बिंदु मेरी शोध परियोजना के आधार बिंदु होंगे। जिनके अंतर्गत विविध साक्ष्य अपेक्षित होंगे, संसाधन आवश्यक होंगे, विविध क्षेत्र के लोगों से संपर्क भी अनिवार्य होगा। निष्कर्षतः काशी की भित्तिचित्र परंपरा से जुड़े लोक चित्रकारों के कृतित्व का एवं उनके परिवेश का अध्ययन, उपयोगी समाधान का दिशा संकेत कर सकेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

संदर्भ-

  1. रामचन्द्र शुक्ल : कला का दर्शन, 1964, पृ0सं0-94
  2. वाचस्पति गैरोला : भारतीय चित्रकला, मित्र प्रकाशन, इलाहाबाद, 1963, पृ0सं0-246
  3. महामहोपाध्याय श्री गोपीनाथ : लोकसंस्कृति अंक, सम्मेलन पत्रिका लेख, पृ0सं0-19
  4. श्री रायकृष्ण दास : उस्ताद रामप्रसाद, उत्तर प्रदेश पत्रिका, 1973, पृ0सं0-11
  5. डॉ0 एच,एन. मिश्र : बनारस की चित्रकला, संस्करण, 2003, पृ0सं0-1916.
  6. श्री रायकृष्ण दास : लेख-एक बहुमूल्य संकलन के अमूल्य संस्मरण, धर्मयुग, 1971, पृ0-11
  7. असित कुमार हाल्दार : भारतीय चित्रकला, 1959, पृ0सं0-94

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