काशी की लुप्त होती वाशपेंटिंग कला

परिवर्तन इस संसार और प्रकृति की अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। जीव जन्तु, पशु-पक्षी, वनस्पति और कला संस्कृति, भाषा, बोली सभी कुछ बदलती रहती है। बदलाव की इस प्रक्रिया में विकास और विनाश भी एक साथ ही अनवरत चल रहे हैं।

उपरोक्त सिद्धान्त कला के क्षेत्र में भी पर्याप्त रूप से देखने को मिलता है। इसके अनेक उदाहरणों में लुप्त हुई दृश्य कला की वाश पेंटिंग विधा को भी लिया जा सकता है। दो तीन दशक पूर्व काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कलाकारों में जलरंगों से चित्र चित्राणि की यह प्रभावी विद्या प्रतिष्ठा का विषय रही है।

लेकिन आज इस विधा से चित्र बनाता यहां कोई नहीं दिखता और इस विधा के जानकार भी अब यहाँ नहीं रहे। कभी इस विधा से गहरे जुड़े काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के दृश्य कलासंकाय के एक मात्र वाशपेंटिंग विशेषज्ञ वरिष्ठ कलाकार वेद प्रकाश का कहना है कि सरलतम कला तकनीकों के विकास से लम्बी प्रक्रियाओं को प्राथमिकता दे रहा है।

वाशपेंटिंग के बन्द होने के कारणों में सबसे प्रमुख कारण यही है। वाशपेंटिंग चित्रों में रंग भरना फिर धुलना, सुखाना। पुनः रंग भरना और धूल सुखाकर फिर रंग भरना। इस प्रक्रिया को ग्यारह और इक्कीस बार लगातार दुहराना पड़ता है। जिसके चलते कलाकार को अपनी कलाकृति पूरी करने में लम्बा समय लग जाता था। जिसमें कभी पानी के प्रभाव से कागज खराब हो जाता, तो कभी अन्य व्यवधानों के चलते कलाकृति का निर्माण बीच में ही रुक जाता। इस सप्ताह कभी-कभी कलाकार के सारे किये कराये पर पानी फिर जाता। जबकि आयल और पोस्टर कलर तथा अन्य आधुनिक कला विधाओं के सामने इस प्रकार की समस्याएं बहुत कम है।

चीन से चलकर कलकत्ता के बंगाल स्कूल आफ आर्ट में पहुंची यह विदेशी कला बाद में प्रयाग से लखनऊ होती हुई बनारस पहुंची थी। इस कला विधा में कागज का विशेष महत्व होता था। इसके लिये हैण्डमेड या कैंटपेपर और वाशमैन का प्रयोग होता था। कागज की सतह दानेदार होती थी, कागज ऐसा लिया जाता था जिसमें अन्दर तक रंग न घुसे। लगाने के बाद रंग अपना रूप न बदले। इस कार्य के लिये बन्धित ड्राइंग करने के बाद ही कलाकृति का निर्माण आरम्भ किया जाता था। रंग भरने के बाद कागज को ट्रे में डूबोकर एक से आधे घंटे तक रख दिया जाता था। पुनः उसे सुखाकर मुलायम ब्रश से उस पर पानी से धुलाई की जाती थी, धुलाई के बाद सुखाकर पुनः रंग लगाया जाता था। इस पूरी पेंटिंग के दौरान कागज को किसी लकड़ी या अन्य किसी वस्तु के फ्रेम पर कसकर रखा जाता जिससे कागज सिकुड़ कर लहरदार न हो जाये। इस विधा द्वारा काशी में मूर्त और अमूर्त दोनों तरह के चित्रों का निर्माण हुआ है।

भारत कला भवन में इस शैली के विख्यात कलाकारों की कृतियां आज भी संग्रह में देखने को मिल जाती है। जिसे देख कला की इस विधा का अच्छी तरह अन्दाजा लगाया जा सकता है।

मधु ज्योत्साना

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