काशी और कबीर

काशी में कबीर का जन्म हुआ। काशी में ही उन्हें गुरु मिले। काशी में ही ज्ञान मिला। कहते हैं गंगा के घाट पर रामानन्द के खड़ाऊँ से कबीर कुचल गये थे और गुरु के मुख से बरबस राम नाम का महा मंत्र निकल गया। दीक्षा मिल गयी। यह ज्ञान प्राप्ति की अनूठी शैली थी। ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में कुचले जाने की क्रिया का पहला उपयोग था। इसकी परिणति काशी से कबीर के निर्वासन या आत्मनिर्वासन में हुई। किंवदन्तियाँ बताती हैं कि काशी में रहते हुए कबीर पर अनेक हमले हुए। इस हमले में राजे महराजे, मुल्ला मौलवी, पण्डे पुरोहित सब एक साथ थे। आखिर वह कौन सी वजह थी कि आपस में लड़ने कटने वाले कबीर के साझा दुश्मन हो गये थे? कबीर ने ऐसा क्या कर दिया या कह दिया कि वह पूरे जमाने को बर्दाश्त नहीं हुआ और सब कबीर के पीछे पड़ गये।

कबीर व्यवसाय से बुनकर थे। उन्होंने देखा कि दुनिया की चादर मैली हो गयी है। परमात्मा की बनायी स्वच्छ और सुन्दर चादर को सुर नर मुनि ने ओढ़ कर मैली कर दी है। उन्होंने यही तो कहा कि नयी चादर बुननी होगी। केवल कहा नहीं वे झीनी झीनी चादर बुनने में लग गये। सुर, नर, मुनि, राजा, मुल्ला पंडा पुरोहित सब के सब परेशान! नयी चादर बुनी गयी, दुनिया नयी तरह से परिभाषित की गई तो उनकी जमी जमाई दूकानों का क्या होगा? उनके विशेषाधिकारों का क्या होगा? कबीर केवल नयी चादर नहीं बुन रहे थे वे वर्ण की श्रेष्ठता, जाति की श्रेष्ठता, धर्म का पाखण्ड सबको चुनौती दे रहे थे। इसलिए सब को खटक रहे थे।

कबीर ने जो ज्ञान प्राप्त किया था वह बाजार से खरीदा हुआ ज्ञान नहीं था – वह कुचले जाने से पैदा हुआ ज्ञान था, ऐसा ज्ञान जो असीम साहस से भर देता है। ऐसा साहस जो दुनिया की प्रचलित नियम नियमावली, रीति रिवाज रूढ़ियों परम्पराओं को अस्वीकार कर सकें। इस अपूर्व साहस के साथ उन्होंने एक नयी चादर बुनी। यह प्रेम की चादर थी। यह चादर किसी विशेषाधिकार से नहीं मिलने वाली थी-

              प्रेम न बारी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाइ

                                     राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाइ।

अब विशेषाधिकारों की अभ्यस्त दुनिया मूल्य चुकाने के लिए कहाँ तैयार होती! और मूल्य भी कोई साधारण नहीं – सीस का मूल्य। अहंकार का विसर्जन। फिर वही मुश्किल। अहंकार छोड़ना यानी विशेषाधिकार छोड़ना। कौन तैयार होता यह सब छोड़ने के लिए।

लेकिन कबीर के इस नये प्रस्ताव ने राजा और परजा को, ब्राह्मण और शूद्र को, ज्ञानी और मूर्ख को, तपस्वी और गृहस्थ को प्रकारान्तर से विशिष्ट और सामान्य को एक भावभूमि पर खड़ा कर दिया।

कबीर ने दसरथ सुत से अलग रामनाम का नया मर्म अन्वेषित किया। इस नये मर्म में सबके लिए गुंजाइश थी, सबके लिए जगह थी। खास तौर से उनके लिए जो शताब्दियों से तिरस्कृत और बहिस्कृत थे, लांछित और उपेक्षित थे। इस निर्गुण की पूजा में साधन व्यर्थ थे – प्रेम अपरिहार्य था। जिनके पास साधन नहीं थे वे इस प्रेम मार्ग पर चल पड़े। जो साधन सम्पन्न थे उनका चलना मुहाल हो गया। जो चलना राह मुश्किल है हमने सिर बोझ भारी क्या? साधन का बोझ लिए हुए लोग अटके भटके ठिठके रहे- इधर प्रेम का घोड़ा दिग्विजय के लिए निकल पड़ा। ज्ञान की आँधी चल पड़ी। ठिठके और अटके हुए लोग भी आँधी के साथ बह चले। कालान्तर में जब ऑधी का जोर कुछ थमा तो साधन के साथ आये हुए लोगों ने अपनी गठरी सभाली और पुराने टेक पर चल पड़े। कबीर के दुश्मन बाहर से भीतर आ गये। उन्होंने कबीर की बानी के विरूद्ध एक और कबीर को खड़ा कर दिया। कबीर की मूर्तिया बना डाली। प्रेम और ज्ञान के मार्ग को छोड़कर नये कर्म काण्ड विकसित किये। पत्थर पूजने का विरोध करने वाले कबीर की पत्थर की मूर्तिया बनायी गयीं, मंदिर बनाये गये, और कबीर की वाणी को दबाने की कोशिश की गयी। संतो के घर में झगरा भारी होने लगा। एक पंथ में कई पंथ बने।

पर माया को पहचानने वाले कबीर जग की चतुराई समझते थे और जलाने यानी व्यर्थ करने की सामर्थ्य रखते थे। माया ठगिनी है यह जानते थे और माया से उपर उठने की सामर्थ्य रखते थे। इस सामर्थ्य ने ही उन्हें वह आत्म विश्वास दिया जिससे वे कहते रहे – हम न मरै मरिहै संसारा।

कबीर के जिस निर्वासन या आत्म निर्वासन की चर्चा की गई उसका भी एक खास अर्थ है – काशी का माहात्म्य यह है कि यहाँ मरने वाला अनिवार्यतः मुक्ति प्राप्त करता है। महज काशी में रहने और मरने से मिलने वाली मुक्ति कबीर को नहीं चाहिए थी। उन्हें अपने लिए मुक्ति का नया रास्ता तलाशना था – ऐसा रास्ता जो मगहर में रहने और मरने वाले के लिए भी सुलभ हो।

इस तरह देखें तो कबीर पहले से चले आ रहे विशेषाधिकार को चाहें वह जिस भी आधार पर रचा गया हो, चुनौती देते हैं। वे मनुष्य को विशिष्ट से सामान्य बनाते हैं कहने की जरूरत नहीं कि विशिष्ट होने का बोध हमारी समस्याओं के मूल में है। हम विशिष्ट और श्रेष्ठ हैं। के साथ यह बोध भी सक्रिय होता है कि दूसरा सामान्य और हीन है।  हमारी समकालीन दुनिया ने श्रेष्ठता और विशिष्टता के ऐसे -ऐसे आख्यान रच दिए हैं कि दुनिया परायों और परायेपन से पट गई है। समकालीन दुनिया के में जो अशान्ति है, संघर्ष है, घृणा है, उपद्रव है उसके मूल में परायेपन की यह धारणा ही है।

विशेषाधिकार और विशिष्टता को अस्वीकार करने वाली कबीर की वाणी अस्ल में परायेपन की धारणा को खत्म करने वाली है। परायेपन का तर्क दुनिया की समस्याओं का समाधान घृणा में देखता है। इसके विपरीत कबीर विशेषाधिकार और विशिष्टता से मुक्त होकर प्रेम की दुनिया रचने का प्रस्ताव करते हैं। ऐसी दुनिया जिसके सभी निवासी बिना किसी भेद भाव के पुकार सकें – बालम आउ हमारे गेह रे।

 

 

सदानन्द शाहीः

 

साखी पत्रिका के सम्पादक। प्राचीन एवं मध्यकालीन कविता के अध्येता। डाड फेलोशिप के तहत जर्मनी के हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में कार्य। जर्मनी, फ्रांस, इटली, अमेरिका, मारीशस के विभिन्न विश्वविद्यालयों में कबीर पर व्याख्यान। एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित जिनमें एक कविता संग्रह भी है। सम्प्रति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर।

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