कबीर कीर्ति मन्दिर (कबीर प्राकट्य धाम) लहरतारा

         गगन मण्डल से उतरे, सद्गुरु सत्य कबीर।

         जलज मांहि पौढ़न किये, सब पीरन के पीर।।

    कबीरदास के जन्म के सम्बन्ध में कई किवदतिया प्रचलित है। कुछ लोगों का यह कहना है कि संवत 1455 (सन् 1398) की ज्येष्ठ पुर्णिमा दिन सोमवार को मांगलिक ब्रह्ममुहुर्त में काशी के लहरतारा तालाब के किनारे स्वामी रामानन्द के शिष्य अष्टानन्द ध्यानमग्न थें, अचानक उन्हें कुछ आभास हुआ और उन्होंने अपने आंखे खोली, उन्होंने देखा कि आकाश से एक दिव्य ज्योतिपूंज तालाब में खिले एक कमल पुष्प पर पड़ी और क्षण मात्र में वह ज्योतिपूंज नवजात शिशु के रूप में परिवर्तित हो गया। जबकि कुछ लोगों के मध्य यह मान्यता है कि निरू-निमा नामक नव दम्पत्ति लहरतारा तालाब के पास से गुजर रहे थे तभी उनकि दृष्टि तालाब के पास पड़े एक नवजात शिशु पर पड़ी, मोहवश नव दम्पत्ति ने शिशु को अपनाकर उसका पालन-पोषण किया, कालान्तर में यहीं बालक कबीरदास नाम से संसार में प्रसिद्ध हुआ।

    सन् 1948 में पंथ श्री हजुर उदित नाम साहेब (आचार्य कबीर पंथ) के मन में लालसा जगी की कबीरदास के जन्म स्थान का दर्शन हो जाये। उन्होंने लोगों से पुछकर कबीरदास के जन्म स्थान का पता लगाया और दर्शन किया। उनके मन में विचार आया कि पवित्र स्थान पर कबीर पंथ का केन्द्र स्थापित किया जाये। 18 वर्ष पश्चात सन् 1967 में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन श्री हजुर उदित नाम साहेब ने कबीर पंथ के महन्त, सन्त एवं भक्तो के उपस्थिति में वर्तमान कबीर मन्दिर की नींव रखी, आम जनता एवं पंथ अनुयायीयों के सहयोग से सन् 2002 में मन्दिर का निर्माण पूर्ण हुआ, मन्दिर निर्माण में लाल पत्थरों का प्रयोग किया गया है। एवं शैली कलात्मक एवं आर्कषक है। जहाँ पर मन्दिर में कबीरदास की कमल पुष्प पर प्रतिमा है वहीं पर कबीरदास निरू-निमा को प्राप्त हुये थे। मन्दिर परिसर में ही एक तालाब स्थित है जो कबीर पंथियों में श्रद्धा तीर्थ के रूप में जाना जाता है। दस जून को मन्दिर परिसर में कबीर जयन्ती का उत्सव मनाया जाता है इस अवसर पर तीन दिवसीय विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जिसमें कबीर अमृतवाणी एवं संत्सग प्रमुख है। गुरू पूर्णिमा को भी संत्सग एवं कबीर अमृतवाणी जैसे कार्यक्रमों का आयोजन होता है। वर्तमान में मन्दिर के मुख्य आचार्य पंथ श्री हजुर अर्धनाम साहेब है। मन्दिर अक्टुबर से फरवरी तक सुबह 7 से 12 बजे तक एवं सायं 3 बजे से 5 बजे तक तथा मार्च से सितम्बर तक सुबह 5.30 से 11 बजे तक एवं सायं में 4 से 6 बजे तक आम दर्शनार्थियों के लिये खुला रहता है।

    मन्दिर परिसर में ही प्राणीक हिलींग पद्धति द्वारा लोगों को चिकित्सा सेवा प्रदान किया जाता है। मन्दिर में देश-विदेश के साथ ही स्थानीय भक्तों एवं अनुयायीयों का अवागमन होता है। मानव मात्र को सत्य, अहिंसा, एकता तथा विश्व बन्धुत्व का उपदेश देने वाले सद्गुरू कबीर उस समय यहाँ दुर-दुर तक जल एवं जलकुम्भी दिखाई पड़ रही थी, उन्होंने कबीरदास का ध्यान कर उस जल को अपने मस्तक से लगाया।

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