जंगमबाड़ी मठ वाराणसी

वाराणसी शहर की पहचान विश्व में मंदिरों, मठों, आश्रमों के लिए रही है। वैसे तो यहां मठों की बात की जाये तो कई ऐतिहासिक मठ रहे हैं। जिनसे काफी समृद्ध इतिहास जुड़ा हुआ है लेकिन सबसे प्रचीन मठ की बात की जाये तो यह गौरव जंगमबाड़ी मठ को प्राप्त है। पहले इस मठ को हरिकेश आनंदवन नाम से जाना जाता था। जंगमबाड़ी अर्थात शिव को जानने वालों के रहने का स्थान। मठ के सभी पीठाधिपति शैव सम्प्रदाय के अनुयायी और उसके ज्ञाता होते हैं। काशी का यह अति प्रचीन मठ अपने आप में इतिहास के कुछ उस हिस्से को समेटे हुए है जिसकी तस्वीर अमूमन लोगों को देखने के लिए नहीं मिलती है। इस मठ को भारतीय राजाओं के अलावा कट्टर मुस्लिम शासकों ने भी काफी कुछ दान किया। दान की गयी कुछ वस्तुओं को आज भी मठ में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में संरक्षित किया गया है। इस ऐतिहासिक एवं प्राचीन मठ की स्थापना छ्ठवीं शताब्दी में हुई। हालांकि कहा जाता है कि यह इससे भी पुराना रहा है। यह मठ शैव सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र रहा है। इस सम्प्रदाय में विश्वास रखने वाले साधु-संतों का यहां आना-जाना लगा रहता है साथ ही बहुत से महात्मा स्थायी निवास करते हैं। वीरशैवमत के संस्थापक पंचाचार्यों में से एक विश्वाराध्य जी ने इस मठ की स्थापना की। इतिहास के पन्नों में झांक कर देखें तो इस मठ को मुस्लिम शासक हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब एवं मुहम्मद शाह समेत अन्य शासकों ने दान दिया। हुमायूं ने मठ में रह रहे साधुओं के लिए तीन सौ बीघा जमीन दान दी। इसी तरह अकबर ने 480 बीघा जमीन मठ को दान किया। जिसका उल्लेख दानपत्र में है। वहीं कट्टर मुस्लिम शासक औरंगजेब ने भी मठ को दान किया। आज भी औरंगजेब का हस्ताक्षर किया हुआ पत्र मठ में संरक्षित करके रखा गया है। वहीं काशी के राजा जयनन्ददेव ने भी इस मठ को दान किया। जिसका विवरण महाराजा प्रभुनारायण सिंह ने एक ताम्रपात्र पर लिखवाया था जो आज भी मठ में सुरक्षित रखा गया है। कहा जाता है कि पहले काशी विश्वनाथ मंदिर जंगमबाड़ी मठ के ही अधीन था।

बाद में मठ से यह अधिकार ले लिया गया। हालांकि आज भी मठ में विश्वनाथ जी के श्रृंगार वाले दिन सजने वाली चांदी की पंचमुखी शिवमूर्ति रखी हुई है। इस मठ की ऐतिहासिक महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है कि यहां बैठकर इसके प्रथम आचार्य ने उपदेश दिया था। मठ में पुस्तकालय भी है। इस पुस्तकालय में प्राचीन संस्कृति सभ्यता एवं इतिहास से जुड़े दुर्लभ संग्रह मौजूद हैं। साथ ही यहां संग्रहित उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र का ‘गबन’ ‘गोदान’ और ताड़ पत्रों पर लिखे प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ एवं ताम्रपत्र एवं ताइपत्र पर लिखने के साधन सहज ही लोगों को आकर्षित करते हैं। जंगमबाड़ी के बारे में कहा जाता है कि इस मठ में भगवान विश्वाराध्य जी का ज्ञानपीठ स्थापित है। वीर शैवमत के संस्थापक जगतगुरू पंचाचार्य पृथ्वी पर शिवलिंगों से अवतार लेकर शिवसिद्धांत तथा शिवभक्ति का प्रचार करते हैं। इस मठ से दक्षिण भारतीयों का अधिक जुड़ाव रहा है। काशी आने वाले अधिकतर दक्षिण भारतीय इस मठ में आते हैं। वर्तमान में यह मठ 50 हजार वर्गफुट में स्थापित है। इस मठ का मुख्य द्वार सोनारपुरा से गोदौलिया जाने वाले मार्ग पर स्थित है। मुख्य द्वार के बाद धर्मरत्न कल्याणी महाद्वार है। इसके बाद शिव मंदिर है। इसके आगे बढ़ने पर कैलाश मंडप मठ के संस्थापक जगतगुरू विश्वराध्य का मूल पीठ है। परिसर में जगतगुरू का दरबार हाल, हरिश्वर मंदिर, जनमंदिर, पुस्तकालय भक्त निवास, शोभा मंडप आदि स्थापित हैं। मठ में परम्परा रही है कि यहां के महन्त की गद्दी खाली होने पर नये महन्त को गद्दी दी जाती है। केवल उसी दिन नये महन्त को जहां प्रथम आचार्य ने उपदेश दिया था वहां बैठाया जाता है बाकी दिन उस पीठ पर पूजा होती है। यह मठ केवल धार्मिकता एवं पूजा-पाठ संतों साधुओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक दायित्व का भी निर्वहन कर रहा है। मठ में विद्यार्थियों के रहने एवं खाने की व्यवस्था निशुल्क है। वहीं गरीब छात्रों को मेडिकल एवं इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मठ की ओर से छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाती है। साथ ही काशी दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए चिकित्सा सुविधा भी की जाती है एवं विधि विधान से पूजा पाठ की व्यवस्था की जाती है। मठ की ओर से समय-समय पर कई मंदिरों का जीर्णोद्धार भी किया गया है। इतना कुछ समेटे यह ऐतिहासिक मठ वर्तमान में काशी का धरोहर बन चुका है। जिसके अतीत से जुड़ा हुआ है बेहतरीन इतिहास। जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक एवं धार्मिक सम्पदा का दर्शन कराता है।

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