काशी में इस्लाम

-अब्दुल बातिन नोमानी

(मुफ़्ती-ए-शहर)

काशी में इस्लाम आज से बहुत अरसे पहले आया। हिन्दुस्तान ही वह स्थान है जहां अल्लाह ने पहले इंसान आजम अली सलाम को भेजा था। अल्लाह ने जब उन्हें बनाया तो स्वर्ग में रहने का निर्देश दिया लेकिन कुछ शैतानों ने आजम अली सलाम को बहकाना चाहा। इस पर अल्लाह ने आजम अली सलाम को जमीं पर भेज दिया। धरती के जिस स्थान पर वे आये वह हिन्दुस्तान ही था। अल्लाह के संदेशों को लेकर नबी हजरत मोहम्मद साहब करीब 15 सौ वर्ष पहले मक्के में आये। मक्के और भारत के बीच शुरू से ही व्यापारिक सम्बंध रहे। भारत से काफी मात्रा में मसाले और यहां की बनी बेहतरीन तलवारों को मक्के में काफी पसंद किया जाता था। एक बार मोहम्मद साहब ने चन्द्रमा की ओर अपनी अंगुली उठा दी तो वह दो टुकड़ों में बंट गया। उस समय भारत के राजा मालीबार थे। राजा मालीबार की एक आदत थी, उन्होंने एक रोजनामचा बनाया था उसमें जो भी खास घटनायें होती थीं उसे लिखते थे। उन्हें जब यह पता चला कि किसी के अंगुली दिखाने मात्र से चन्द्रमा दो टुकड़ों में हो गया तो उन्होंने उसे अपने रोजनामचे में लिख कर मोहम्मद साहब से मिलने के लिए मक्का के लिए चले।

हालांकि राजा की मोहम्मद साहब से मुलाकात नहीं हो सकी और रास्ते में ही किसी कारण से उन्हें वापस लौटना पड़ा इस दौरान उनका इंतकाल हो गया। बाद में कुछ लोग उनके रोजनामचे के आधार पर मोहम्मद साहब से मिलने गये और उन्हें उपहार दिया। धीरे-धीरे भारत में इस्लाम की आमद हुई। व्यापारिक सम्बंध और बढ़ती नजदीकियों का असर रहा कि कुछ मुसलमान भारत आये। माना जाता है कि केरल में हिन्दुस्तान की पहली मस्जिद बनी थी। सन् 712 ई0 में मोहम्मद बिन कासिम हिन्दुस्तान के सिन्ध में आये, इस दौरान काफी  लोगों ने ईस्लाम कबूला। इसके बाद सन् 1001 से 1026 तक महमूद गजनवी ने भारत पर अपना प्रभुत्व बनाया। गजनवी के समय में भारत में ईस्लाम धर्म खूब फला-फूला। महमूद गजनवी के भांजे सैयद सालार मसूद गाजी थे। उनके निर्देश पर एक काफिला सन् 1022 में इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए मलिक अफजल अल्वी के नेतृत्व में काशी आया। यह काफिला बनारस के उत्तरी क्षेत्र में पहुंचा। मलिक अफजल अल्वी सूफी संत थे, जिनके नाम से अलईपुरा मोहल्ला बसा हैं, सालारपुरा मोहल्ले का नाम सैयद सालार मसूद गाजी के नाम पर पड़ा। इसी मोहल्ले में सैयद सालार मसूद गाजी का मकबरा भी है। वर्तमान में जो अलईपुरा मोहल्ला है वह पहले अल्वीपुरा के नाम से जाना जाता था। इस मोहल्ले का नाम मलिक अफजल अल्वी के नाम पर पड़ा है। इसी मोहल्ले में मलिक अफजल अल्वी का मकबरा भी स्थित है। बनारस में तीन मोहल्ले मदनपुरा, लल्लापुरा एवं अल्वीपुरा में ही इस्लाम की शुरूआत हुई इसलिए ये मोहल्ले खास हैसियत रखते हैं। उस काफिले के साथ सिराजुद्दीन कल्ची भी इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए बनारस आये थे। इनका मजार औरंगाबाद क्षेत्र के कल्ची सराय मोहल्ले में कल्ची का मजार नाम से है। इसी काफिले में मलिक मोहम्मद बाकिम भी आये थे। सालारपुरा मोहल्ले में इनका मजार है। इन्हीं के नाम पर बाकराबाद मोहल्ले का नाम पड़ा है। इसी काफिले में जलालुद्दीन साहब भी आये हुए थे। इन्होंने भी बनारस में इस्लाम का प्रचार-प्रसार किया। इन्हीं के नाम पर सालारपुरा से सटा जलालुद्दीनपुरा मोहल्ला का नाम पड़ा। काफिले के साथ बटउ शहीद भी आये थे। इनका मजार त्रिलोचन मच्छोदरी के पास है। मजार के उपर एक ही खम्भे पर मस्जिद बनी हुई है। मच्छोदरी और उसके आस-पास के सभी मोहल्ले उसी जमाने के हैं। भार्गव प्रेस के पीछे बटउ शहीद का मजार है। लंका के पास याकूब शहीद का मजार है ये भी उसी काफिले के साथ बनारस आये हुए थे। इस तरह धीरे-धीरे बनारस में मुस्लिमों की तादात बढ़ती गयी। 1119 में ढाई कंगूरे की मस्जिद बनी यह चौहट्टा लाल खां में है। दो नीम कंगूरा यानी दो और नीम यानी आधा इसलिए इस मस्जिद को ढाई कंगूरे की मस्जिद कहा जाता है। इसे बनारस की पहली मस्जिद भी कहा जाये तो बेजा न होगा। इसी तरह काशी स्टेशन के पास की मस्जिद भी उसी जमाने की है। सन् 1193 में मोहम्मद गोरी जब भारत में शासन कर रहा था उसके करीबी बनारस के ही सैयद जमालुद्दीन थे। जमालुद्दीन को बनारस का सूबेदार नियुक्त किया गया। इन्हीं के नाम पर अलईपुरा मोहल्ले के पास स्थित जमालुद्दीनपुरा का नाम पड़ा। इसलिए यह कहना गलत न होगा कि बनारस में उसी जमाने से यानी सन् 1022 में इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ। इस शहर की यही विशिष्टता रही है कि चाहे जैसे भी हालात रहे हों हिन्दू-मुस्लिमों ने गंगा-जमुनी तहजीब को बनाये रखा।

                                                                                                                                                                

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