हरिहर बाबा आश्रम अस्सी वाराणसी

वाराणसी में संत-महात्माओं की मौजूदगी आदिकाल से रही है। यह देवभूमि बड़े-बड़े संतों को सदैव ही लुभाती रही है। यही कारण है कि हिमालय पर ध्यान योग में लगे संत भी कभी न कभी काशी जरूर आये और यहां प्रवास किया। इसी तरह के एक पहुंचे संत थे हरिहर बाबा। इनकी एक विशिष्टता यह थी कि ये कभी जमीन पर नहीं आते थे। हरिहर बाबा हमेशा गंगा जी की गोद में बजड़े पर निर्वस्त्र ही रहते थे। बाबा की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। अस्सी घाट पर किनारे बजड़े पर रहने वाले बाबा से मिलने के लिए लोग वहीं जाकर उनसे अशीर्वाद लिया करते थे। हरिहर बाबा के ही शिष्य हुए विश्वनाथ बाबा।

इन्होंने हरिहर बाबा की खूब सेवा की। बाबा नें उसी बजड़े पर ही अपना शरीर त्याग दिया। इसके बाद विश्वनाथ बाबा ने हरिहरबाबा की स्मृति में अस्सी क्षेत्र में उन्हीं के नाम पर एक आश्रम की स्थापना की। इस आश्रम में हरिहर बाबा जिस बजड़े पर रहा करते थे उसका एक हिस्सा एवं उनके बजड़े पर टंगा रहने वाला घण्टा सुरक्षित करके रखा गया जो आज भी आश्रम में रखा हुआ है। अस्सी घाट से उपर सीढ़ियां चढ़ने अस्सी संगमेश्वर मंदिर के बगल में स्थित यह आश्रम बनावट की दृष्टि से सामान्य है। बीच में बड़ा सा खुला हुआ आंगन, चारो तरफ बरामदे एवं उसके बाद कमरे बने हुए हैं। आश्रम में घुसते ही दाहिनी ओर पहले कमरे में हरिहर बाबा से जुड़ी हुई वस्तुएं एवं उनका चित्र, बजड़े का एक हिस्सा रखा गया है। इसी कक्ष में हरिहर बाबा के शिष्य विश्वनाथ बाबा एवं रवि बाबा की मूर्तियां एवं चित्र रखे हुए हैं। वर्तमान में आश्रम की देखभाल हरिहर बाबा की शिष्या दीप्ति मुखर्जी कर रही हैं। वर्ष में तीन बार आश्रम में भण्डारे का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को हरिहर बाबा की याद में भण्डारे का आयोजन किया जाता है, इस दिन आश्रम में भजन कीर्तन होता है साथ ही काफी संख्या में संत-महात्माओं का आश्रम में आगमन होता है। इसी तरह प्रत्येक वर्ष 15 मार्च को विश्वनाथ बाबा एवं 12 दिसम्बर को रवि बाबा की याद में भण्डारा किया जाता है। भण्डारे की खास बात यह होती है कि इसमें हरिहर बाबा का पीतल का ड्रम प्रयोग किया जाता है। इस आश्रम में ज्यादातर बंगाल के भक्त आते हैं। अस्सी चौराहे से थोड़े ही दूर पर घाट की ओर यह आश्रम स्थित है।

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