हनुमान जी व्यायामशाला काशी वाराणसी

भले ही समय बदला, परिवेश बदला, रहन-सहन का ढंग बदला लेकिन काशी में एक चीज जो नहीं परिवर्तित हुई वह है यहां का मस्ती भरा अंदाज। आज जबकि भविष्य के ताने-बाने s बुनने और उसे संवारने के लिए बड़े शहरों सहित मझोले व छोटे शहरों के लोगों के पास बात करने तक कि फुर्सत नहीं है वहीं, खांटी बनारसी अब भी मुंह में पान घुलाये या चाय की चुस्की के साथ चिंता से मुक्त गली मोहल्ले में घंटों अड़ीबाजी करते हुए मिल जायेगा। इसका यह मतलब नहीं है कि यहां के लोग अपने भविष्य को लेकर गंभीर नहीं हैं बावजूद इसके काशी की मस्तमौला परंपरा आज भी देखने को मिल जाती है। भोले की इस नगरी की कुछ जीवित परंपराओं में से एक है अखाड़ा। नये बनारस में अब शरीर शैष्ठव यानी फिट रहने के लिए तमाम जिम खुल गये हैं जहां लोग बाकायदा शुल्क जमाकर कालीन पर आधुनिक साजो-सामान से व्यायाम करते हैं। जिम में आकर्षण के सारे सामान होने के बाद भी काशी के अखाड़ों में दो-दो हाथ करने वाले पहलवानों की कमी नहीं है। पीली मिट्टी में लोटने के साथ गदा, जोड़ी सहित कुश्ती के दाव सीखते तमाम युवा काशी के पुरातन अखाड़ों में मिल जायेंगे। वहीं, पुराने पहलवान भी अखाड़ों की शान बढ़ाने में पीछे नहीं रहते। काशी के कई अखाड़ों के समाप्त होने के बाद भी बहुत से अखाड़े आज भी व्यायाम करने वालों से गुलजार हैं। जहां से कुश्ती का ककहरा सीखने वाले पहलवान दूर-दूर तक दंगलों में पहलवानी का लोहा आज भी मनवाते हैं। अखाड़ों की इसी श्रृंखला में शिवाला घाट पर स्थित हनुमान व्यायामशाला का अतीत पहलवानी की दुनिया में रसूखदार रहा है। इस अखाड़े की माटी से दांव-पेंच सीखकर कई पहलवानों ने पहलवानी में काफी ख्याति अर्जित की। दूर-दूर होने वाले दंगलों में यहां के पहलवान बढ़चढ कर हिस्सा लेते थे। इससे जुड़े पहलवानों का ज्यादातर समय अखाड़े में रियाज करते ही बीतता था। इस अखाड़े की स्थापना 102 वर्ष पहले 1912 में हुई थी। उस दौरान इस अखाड़े का स्वरूप अलग था। करीब एक बिस्से क्षेत्र में फैले इस अखाड़े में उत्साही युवा अभ्यास करने आने लगे। धीरे-धीरे अखाड़े में आने वालों की संख्या काफी अधिक हो गयी। परिणामतः अखाड़े में पहलवानों की स्वस्थ प्रतियोगिता होने लगी। जिसका नतीजा यह हुआ कि यहा के पहलवानों ने कुश्ती के क्षेत्र में काफी नाम कमाया। इस अखाड़े की उपज रहे कन्हैया, रामनाथ, जगन्नाथ, पापे सरदार पहलवान ने कई दिग्गजों को दंगल में धूल चटाया। करीब 70 वर्ष के हो चुके पहलवान चमन प्रजापति अब भी 2 सौ से ज्यादा बार तक गदा भांजते हैं। उनकी यह नियमित दिनचर्या है। उनके अनुसार इस अखाड़े की बड़ी प्रतिष्ठा थी। यहां एक से बढ़कर एक बलिष्ठ पहलवान हुए। जिन्होंने यहां का नाम रोशन किया। वहीं, छोटू पहलवान का जोड़ी भांजने में कोई सानी नहीं है। लड़की के बने जोड़ियों जिनका वनज 20-20 किलोग्राम है उसे बिना रूके छोटू सौ बार से अधिक बार फेरते हैं। अखाड़े में 30 जोड़ी, 35 गदा, 2 नाल समेत व्यायामक s आधुनिक सामान भी मौजूद हैं। वर्तमान में करीब तीन दर्जन लोग अखाड़े में नियमित रूप से व्यायाम करने पहुंचते हैं। अखाड़ा सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है। हालांकि ज्यादातर लोग दोपहर में ही रियाज के लिए आते हैं। अखाड़े में हनुमान जी का छोटा सा मंदिर भी है अखाड़े में रियाज करने वाले हनुमान जी का आशीर्वाद लेकर ही उतरते हैं।

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