हनुमान घाट वाराणसी

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ऐसी मान्यता है कि इस घाट पर स्थित हनुमान मंदिर की स्थापना तुलसीदास के द्वारा की गई है, इस मंदिर के कारण ही इसका नाम हनुमान घाट पड़ा। घाट पर नागा साधुओं का प्रसिद्ध जूना अखाड़ा है। गीर्वाणपदमंजरी (सत्तरहवीं शताब्दी) के अनुसार इसका पूर्व नाम रामेश्वर घाट था, इसके संदर्भ में यह मान्यता है कि स्वयं भगवान राम ने इस शिवलिंग की स्थापना काशी यात्रा के दौरान की थी, जो वर्तमान में जूना अखाड़ा परिसर में है। रामेश्वर शिव को काशी के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में पूजा जाता है। कालान्तर में यहीं रामेश्वरघाट हनुमानघाट हो गया, जिसका प्रथम उल्लेख सन् 1831 में जेम्स प्रिन्सेप ने किया था।

उन्नीसवीं शताब्दी में जूना अखाड़े के महन्त हरिहरनाथ के द्वारा घाट का पक्का निर्माण कराया गया था, बीसवीं शताब्दी के पूवार्द्ध में मैसूर स्टेट द्वारा घाट का पुनः निर्माण कराया गया था। इस घाट के बारे में एक कहावत है कि बनारस के जुआरी नन्ददास ने अपनी एक दिन की कमाई से घाट की सीढ़ियों को बनवाया था।
घाट पर रामेश्वर, सीतेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, भरतेश्वर, शत्रुध्नेश्वर (सभी शिवलिंग) मंदिर, हनुमान, मंदिर, विष्णु मंदिर एवं रूरू भैरव मंदिर है। रामेश्वर शिव तमिलनाडु के रामेश्वर मंदिर का प्रतीक है, जबकि रूरू भैरव को काशी के अष्ट भैरव में स्थान प्राप्त है। विष्णु मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर की चतुर्भुज विष्णु की मूर्ति स्थापित है।
इस घाट का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व प्राचीन काल से ही है, सोलहवीं शताब्दी में बल्लभाचार्य ने इसी घाट पर निवास किया और ब्रह्मलीन हुए। धार्मिक महत्व के कारण यहाँ विभिन्न पर्वों पर स्नान एवं अनुष्ठान तीर्थ यात्रियों एवं स्थानीय लोगों के द्वारा सम्पन्न किया जाता है। इस घाट पर दक्षिण भारतीय तीर्थ यात्रियों की संख्या अधिक रहती है। सन् 1984 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग द्वारा घाट का पुनः निर्माण करवाया गया।

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