बनारस मिण्ट हाउस में हुई थी बी0एच0यू0 स्थापना की पहली बैठक

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

महामना के महान् पुरुषार्थ एवं प्रेरणा से सनातन धर्म महासभा एवं अखिल भारतीय सेवा समिति द्वारा उत्तरी भारत में सनातनधर्म व सेवा समिति के नाम से स्थापित सैकड़ों स्कूल-कॉलेज आज बहुतों के लिए प्रायः अज्ञात हैं। सभी की दृष्टि बी0एच0यू0 पर पड़ती है, जो शिक्षा-क्षेत्र में एक आन्दोलन के रूप में उदित एवं स्थापित हुआ। वस्तुतः काशी हिन्दू विश्वविद्यालय है भी महामना की एक अनुपम व अद्वितीय कृति, जो उनकी स्मृतियों को चिरस्थायी बनाये रखने के लिए अकेले ही पर्याप्त है।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए मालवीय जी ने सन् 1884 को अपने विद्यार्थी जीवन में ही संकल्प कर लिया था। अपनी योजना को मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने देश एवं विश्व के शैक्षणिक इतिहास का गहन अध्ययन किया। इस विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए आप सन् 1902 में विशेष रूप से सक्रिय हुए। सन् 1904 में बनारस के मिण्ट हाउस में पहली बैठक करायी, सन् 1905 में विश्वविद्यालय का प्रास्पेक्ट्स तैयार कर गणमान्य लोगों के विचारार्थ भेजा। इसी वर्ष काशी काँग्रेस अधिवेशन में आपने बी0एच0यू0 प्रस्ताव पर चर्चा करायी। सन् 1906 के सनातनधर्म महासभा अधिवेशन, प्रयाग में भी सर्वसम्मति से इसकी स्थापना को अनुमोदित किया गया। सन् 1911 में ‘हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी’ का गठन कर आप देशव्यापी धन-संग्रह अभियान में लगे। 1 अक्टूबर 1915 को इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कॉन्सिल में बी0एच0यू0 बिल पास हुआ, और 4 फरवरी 1916 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंज ने इसका शिलान्यास किया। 1 अप्रैल 1916 से ‘बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी ऐक्ट’ कार्य करने लगा।

बनारस मिण्ट हाउस में हुई थी बी0एच0यू0 स्थापना हेतु पहली बैठक Madan Mohan Malviya

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के उद्देश्यों व आदर्शों पर प्रकाश डालते हुए पूज्य मालवीय जी ने 22 मार्च 1915 को इम्पीरियल कौंसिल (शिमला) में शिक्षा मंत्री हारकोर्ट बटलर द्वारा बी0एच0यू0 बिल पेश किये जाते समय कहा था- “जीवन ज्योति का यह केन्द्र जो अस्तित्व में आ रहा है, उन विद्यार्थियों को तैयार करेगा, जो ज्ञान में संसार के दूसरे भागों के विद्यार्थियों के समान ही नहीं, वरन् उत्तम जीवन बिताने में, ईश्वर-भक्ति तथा देश-प्रेम में भी प्रशिक्षित होंगे।” उनकी अपेक्षा थी कि- “यह विश्वविद्यालय ऐसा हो, जहाँ हमारे प्राचीन काल की उदात्त पद्धतियों की रक्षा और पूर्व एवं पश्चिम के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान का एक प्रकाश हो सके।” 14 सितम्बर 1921 को बी0एच0यू0 के अपने 12वें दीक्षान्त भाषण में महामना ने कहा था- “काशी हिन्दू विश्वविद्यालय संसार में एक विशेष उद्देश्य और निश्चित कार्यक्रम लेकर उत्पन्न हुआ है। अपने मंदिर के ज्ञानमय स्तम्भों से अन्धकार में पड़े हुए संसार को प्रकाश देने और मनुष्य-मात्र को परम ज्योतिर्मय परमेश्वर की झाँकी दिखलाने के लिए यह पैदा हुआ है।”

एशिया महादेश का यह प्रथम आवासीय एवं शिक्षण विश्वविद्यालय एक राष्ट्रव्यापी बौद्धिक एवं सांस्कृतिक आन्दोलन की उपज है। यह देश का वह पहला विश्वविद्यालय है, जो जन-आकांक्षाओं के अनुरूप पूरी तरह जन-सहयोग से स्थापित हुआ, और देश में पहली बार कृषि, विज्ञान, चिकित्सा, अभियांत्रिकी आदि विभिन्न क्षेत्रों में अनेक नवीन विषयों में उच्च शिक्षा एवं अनुसंधान के प्रबन्धन द्वारा इसने राष्ट्र के चहुँमुखी उत्थान में अग्रणी व अद्वितीय भूमिका निभाई। महान शिक्षाविद् एवं देशभक्त पूज्य महामना मालवीय जी ने भारत की जरूरतों के अनुरूप पहली बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति का एक मौलिक प्रारूप प्रस्तुत किया, जिसके आधार पर इस प्रथम भारतीय विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

महामना के शैक्षणिक चिन्तनों एवं आदर्शों के अनुरूप राष्ट्रीय एकता, साम्प्रदायिक सौहार्द्र और सार्वभौम जीवन-मूल्यों के विकास में अग्रणी यह विश्वविद्यालय युवकों के मानसिक, आत्मिक, चारित्रिक व शारीरिक, हर प्रकार से व्यक्तित्व-निर्माण के लिए सदैव सचेष्ट एवं समर्पित रहा है। यही कारण है कि इस विश्वविद्यालय से निकली प्रतिभायें जहाँ कहीं भी गईं, उसने अपनी एक विशिष्ट व मौलिक पहचान छोड़ी। ‘मैन मेकिंग एण्ड नेशन बिल्डिंग’ इस विश्वविद्यालय का परम ध्येय है, और इस ध्येय पथ पर आरूढ़ रहकर इसने अपने अब तक के इतिहास में अनेक इतिहास-निर्माता उत्पन्न किये, जिन्होंने देश को उन्नति की ओर अग्रसर किया और युग को एक नई दिशा दी। यह सब हमारे उस महान शिक्षाविद् ऋषिकल्प कुलगुरु पूज्य महामना मालवीय जी की त्याग-तपस्या और पुण्य कर्मों का ही प्रभाव है, जिसकी वजह से अनेक विपरीत व कठिन परिस्थितियों में भी यह विश्वविद्यालय सदैव अपनी प्रतिष्ठा व पहचान को बनाये रखने में सफल रहा है।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय राष्ट्र की स्वतंत्रता एवं भारतीय संस्कृति का जीवन्त स्मारक ही नहीं, महामना का प्राण भी है। खुद महामना इस विश्वविद्यालय के प्राण हैं। इस प्राण के बगैर विश्वविद्यालय के अस्तित्व की कल्पना कैसे की जा सकती! अतः विद्यार्थियों के लिए महामना का यह संदेश भी स्मरणीय है-

“हिन्दू विश्वविद्यालय की यह फैली हुई भूमि, हरी मखमली दूब से भरे सुहावने बड़े-बड़े खेल के मैदान, स्वच्छन्द उन्मुक्त वायु, माँ पतित-पावनी गंगा का पुनीत पावन तट, संसार में कहीं भी ऐसा दूसरा स्थान तुम्हारे लिए नहीं। प्रकृति के साथ जीवन को मेल में लाने वाला इतना विशाल क्षेत्र संसार में अन्यत्र है, तो मुझे मालूम नहीं। यहाँ के पवित्र वातावरण से हृदय कोपवित्र बना लो, मन को विमल बना लो, आत्मा को शुद्ध कर लो, संसार में जहाँ भी जाओगे, वहाँ मान के अधिकारी होओगे।”

पूज्य महामना मालवीय जी हिन्दू विश्वविद्यालय के बीस वर्षों (1919 से 1939) तक कुलपति और तत्पश्चात् आजीवन रेक्टर रहे। उन्होंने इस विश्वविद्यालय की स्थापना व विकास के लिये बहुत ही कठिन तप व संघर्ष किया। उनके समय में इस विश्वविद्यालय को सरकार से नाममात्र का (‘ऊँट के मुँह में जीरा’ जैसा) अनुदान मिलता था, उसमें भी राजनीतिक कारणों से कभी-कभी कटौती कर दी जाती थी। ऐसे में भिक्षाटन के सिवा कोई विकल्प नहीं था। इसीलिये महामना को अपने इस प्राणप्रिये संस्था के लिये आजीवन भिक्षुक बने रहना पड़ा और अक्सर यात्रायें करनी पड़ी। जब चलने-फिरने में वे असमर्थ हो गये तब अपने एक दूत के मार्फत अपना अपील-पत्र- राजा-महाराजाओं के यहाँ भिजवाते रहे। धन-संग्रह के लिये उन्होंने अपने आवास मालवीय भवन में अपने बिस्तर के पास दो दान-पात्र भी रखवा दिये थे। उनके दर्शनार्थ नित्य सैकड़ों बाहरी लोग आते और उस दान-पात्र में अथवा उनके चरणों में दानस्वरूप कुछ न कुछ स्वैच्छिक राशि अवश्य रख जाते थे। इस तरह पूज्य महामना ने इस संस्था का पालन-पोषण प्राचीन गुरुकुलों के ऋषि कुलपतियों की तरह किया। वे इस विश्वविद्यालय को ‘दान की संस्था’ मानते थे, इसीलिये इस विश्वविद्यालय से उन्होंने न तो स्वयं के लिये और विश्वविद्यालय के ही किसी कार्य से एक पैसा भी लिया और न अपने परिवार या रिश्ते के किसी सदस्य को सवेतन सेवा करने की कभी इजाजत ही दी।