धरती का शृंगार बनारस

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कोई नहीं समझ पाया है, महिमा अपरम्पार बनारस।

कोई नहीं समझ पाया है, महिमा अपरम्पार बनारस।

भले क्षीर सागर हों विष्णु, शिव का तो दरबार बनारस।।

हर-हर महादेव कह करती, दुनिया जय-जयकार बनारस।

माता पार्वती संग बसता, पूरा शिव परिवार बनारस।।

कोतवाल भैरव करते हैं, दुष्टों का संहार बनारस।

माँ अन्नपूर्णा घर भरती हैं, जिनका है भण्डार बनारस।।

महिमा ऋषि देव सब गाते, मगर न पाते पार बनारस।

कण-कण शंकर घर-घर मंदिर, करते देव विहार बनारस।।

वरुणा और अस्सी के भीतर, है अनुपम विस्तार बनारस।

जिसकी गली-गली में बसता, है सारा संसार बनारस।।

एक बार जो आ बस जाता, कहता इसे हमार बनारस।

विविध धर्म और भाषा-भाषी, रहते ज्यों परिवार बनारस।।

वेद शास्त्र उपनिषद ग्रन्थ जो, विद्या के आगार बनारस।

यहाँ ज्ञान गंगा संस्कृति की, सतत् प्रवाहित धार बनारस।।

वेद पाठ मंत्रों के सस्वर, छूते मन के तार बनारस।

गुरु गोविन्द बुद्ध तीर्थंकर, सबके दिल का प्यार बनारस।।

कला-संस्कृति, काव्य-साधना, साहित्यिक संसार बनारस।

शहनाई गूँजती यहाँ से, तबला ढोल सितार बनारस।।

जादू है संगीत नृत्य में, जिसका है आधार बनारस।

भंगी यहाँ ज्ञान देता है, ज्ञानी जाता हार बनारस।।

ज्ञान और विज्ञान की चर्चा, निसदिन का व्यापार बनारस।

ज्ञानी गुनी और नेमी का, नित करता सत्कार बनारस।।

मरना यहाँ सुमंगल होता और मृत्यु शृंगार बनारस।

काशी वास के आगे सारी, दौलत है बेकार बनारस।।

एक लंगोटी पर देता है, रेशम को भी वार बनारस।

सुबहे-बनारस दर्शन करने, आता है संसार बनारस।।

रात्रि चाँदनी में गंगा जल, शोभा छवि का सार बनारस।

होती भव्य राम लीला है, रामनगर दरबार बनारस।।

सारनाथ ने दिया ज्ञान का, गौतम को उपहार बनारस।

भारत माता मंदिर बैठी, करती नेह-दुलार बनारस।।

नाग-नथैया और नक्कटैया, लक्खी मेले चार बनारस।

मालवीय की अमर कीर्ति पर, जग जाता, बलिहार बनारस।।

पाँच विश्वविद्यालय करते, शिक्षा का संचार बनारस।

गंगा पार से जाकर देखो, लगता धनुषाकार बनारस।।

राँड़-साँड़, सीढ़ी, संन्यासी, घाट हैं चन्द्राकार बनारस।

पंडा-गुन्डा और मुछमुन्डा, सबकी है भरमार बनारस।।

कहीं पुजैय्या कहीं बधावा, उत्सव सदाबहार बनारस।

गंगा जी में चढ़े धूम से, आर-पार का हार बनारस।।

फगुआ, तीज, दशहरा, होली, रोज़-रोज़ त्योहार बनारस।

कुश्ती, दंगल, बुढ़वा मंगल, लगै ठहाका यार बनारस।।

बोली ऐसी बनारसी है, बरबस टपके प्यार बनारस।

और पान मघई का अब तक, जोड़ नहीं संसार बनारस।।

भाँति-भाँति के इत्र गमकते, चैचक खुश्बूदार बनारस।

छनै जलेबी और कचैड़ी, गरमा-गरम आहार बनारस।।

छान के बूटी लगा लंगोटी, जाते हैं उस पार बनारस।

हर काशी वासी रखता है, ढेंगे पर संसार बनारस।।

सबही गुरु इहाँ है मालिक, ई राजा रंगदार बनारस।

चना-चबेना सबको देता, स्वयं यहाँ करतार बनारस।।

यहाँ बैठ कर मुक्ति बाँटता, जग का पालनहार बनारस।

धर्म, अर्थ और काम, मोक्ष का, इस वसुधा पर द्वार बनारस।।

मौज और मस्ती की धरती, सृष्टि का उपहार बनारस।

अनुपम सदा बहार बनारस, धरती का शृंगार बनारस।।

– डाॅ0 रामअवतार पाण्डेय

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