देवरहवा बाबा आश्रम, अस्सी वाराणसी

वाराणसी में संत महात्माओं का मन बरबस ही रम जाता है। मोह माया से मुक्त तमाम संतों ने काशी को ही अपनी तपस्थली बना ली। यहां की आबोहवा के साथ सामन्जस्य बिठाकर अपने आराध्य की भक्ति करते रहे। ऐसे बहुत से संत हुए जिन्होंने दूसरी जगह से यहां आकर अपना निवास स्थान बनाया और तपस्यारत रहे। ऐसे भी अनेकों योगी हुए जो इस पावन नगरी को किन्हीं कारणों से अपना स्थाई निवास नहीं बना सके लेकिन समय-समय पर काशी यात्रा करते रहे। ऐसे ही संतों में से एक थे देवरहवा बाबा। वे अक्सर काशी आने पर गंगा उस पार रेती पर मचान बनाकर रहा करते थे। वहीं अस्सी पर स्थित द्वारिकाधीश मंदिर में भी आकर कुछ समय के लिए रहते थे। अस्सी पर स्थित द्वारिकाधीश का भव्य मंदिर करीब 3 सौ वर्ष प्राचीन है। कथा के अनुसार एक बार दक्षिण भारतीय संत स्वामी कृष्णाचारी महराज को जो की काशी में प्रवास कर रहे थे उन्हें स्वप्न दिखा कि द्वारिकाधीश की प्रतिमा वेणी माधव के पास एक कुंए में है उसे निकाल कर स्थापित करना है। उन्होंने वैसा ही किया और कुंए से द्वारिकाधीश की भव्य प्रतिमा को कुंए से निकाल कर अस्सी पर स्थापित कर दिया। संत महात्मा इस मंदिर में रहकर भजन कीर्तन करते रहे। देवरहवा बाबा भी यहां अक्सर आया करते थे और मंदिर का संचालन किया करते।

धीरे-धीरे उनके शिष्यों की संख्या भी बढ़ गयी। बाद में मंदिर के आस-पास रहने के लिए कई कमरे बनवा दिये गये। पहले इस स्थान को द्वारिकाधीश का मंदिर कहा जाता था लेकिन बाद में इसे परिवर्तित करके द्वारिकाधीश मंदिर एवं देवरहवा बाबा आश्रम कर दिया गया। वर्तमान में इस आश्रम में 50 से ज्यादा साधु संत रहकर साधना में लगे हुए हैं। वहीं इस आश्रम में विद्यार्थियों के निशुल्क रहने एवं खाने की व्यवस्था है। तीन मंजिला इस आश्रम में सबसे पहले बड़े से हाल में द्वारिकाधीश का भव्य मंदिर है। इसी के बगल में एक कमरे में देवरहवा बाबा की प्रतिमा स्थापित की गयी है। संतों ने गो सेवा के उद्श्ये से गाय भी पाल रखी है। यहां के संत वैष्णव सम्प्रदाय परम्परा के अनुयायी हैं। वर्तमान में यहां के मुख्य संत श्री देवरहवा हंस बाबा हैं। इस आश्रम में बड़े आयोजन की बात की जाये तो सभी प्रमुख त्यौहारों पर भजन-कीर्तन होने के साथ ही कथा होती रहती है। वहीं, आषाढ़ शुक्ल पक्ष में योगिनी एकादशी को देवरहवा बाबा की पुण्य तिथि मनायी जाती है। इसके लिए इस मास की तृतीया से ही कार्यक्रम शुरू हो जाता है। इस दौरान रोजाना आश्रम में कथा का आयोजन होता है। साथ ही भजन-कीर्तन चलता रहता है। पुण्य तिथि वाले दिन भण्डारे का आयोजन भी किया जाता है। इस दौरान मंदिर परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। द्वारिकाधीश मंदिर प्रातः 4 बजे ही खुल जाता है लेकिन दर्शन सुबह 8 बजे जब श्रृंगार आरती होती है तब शुरू होता है। मंदिर दोपहर 12 बजे तक खुला रहता है। वहीं शाम को मंदिर पुनः 5 बजे खुलता है जो रात 9 बजे तक खुला रहता है। शायं आरती 8 बजे एवं शयन आरती रात 9 बजे सम्पन्न होती है। अस्सी घाट की ओर बढ़ने पर बायीं ओर मुड़ी गली में यह बड़ा सा आश्रम दाहिनी ओर स्थित है।

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