काशी की बौद्ध कला

 बौद्ध मूर्ति कला के प्राचीन केन्द्र सारनाथ की शैली का प्रभाव भारत में अन्यत्र बनी मूर्तियों के अलावा जावा, द्वीप की बौद्ध मूर्तियों में भी साफ झलकता है। सारनाथ की मूर्ति कला का प्रभाव मथुरा और अजन्ता की मूर्तियों पर भी स्पष्ट रूप से दिखता है। यह इस बात का प्रमाण है कि सारनाथ की तत्कालीन मूर्तिकला भारत की प्रतिनिधि मूर्तिकला है।

    गुप्त काल में पांचवी एवं छठीं शती में सारनाथ में बुद्ध प्रतिमाओं का निर्माण एक नये सफल और सुन्दर रूप में हुआ। पांचवीं शती के अन्त में सारनाथ में बज्रपर्यकासन मुद्रा में बैठी हुई मूर्ति बुद्ध की मूर्ति का निर्माण हुआ। इसका हाथ धर्म चक्र प्रवर्तन मुद्रा में है। इस प्रतिमा के कलात्मक पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध कलाविद एवं इतिहासकार आनन्द वेंकेटश कुमार स्वामी ने इसे ‘शुद्धशील’ की संज्ञा दी है। बुद्ध के प्रथम धर्मोपदेश का मूर्तियों में सफल अंकन गुप्त काल में ही हुआ है। सारनाथ संग्रहालय के केन्द्रीय कक्ष में प्रदर्शित इस प्रतिमा पर पांच भिक्षुओं एवं एक महिला के साथ बच्चे को भी आंका गया है। सम्भवतः ये वही भिक्षु हैं जिन्हें बुद्ध ने प्रथम धर्मोपदेश के बाद अपने पथ में शामिल किया था। इस मूर्ति को पीठिका के मध्य भाग में धर्मचक्र है जो इस घटना का प्रतीक है। इस प्रतिमा का संयोजन सम-बाहु त्रिभुज के आकार में हुआ है। धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा की बुद्ध प्रतिमा के चेहरे पर पूर्ण सौम्यता का अभाव है। अधखुली आँखें (नासाग्रदृष्टि) योग की भावनात्मक अनुभूति को प्रदर्शित करती है। यहां ऐसा प्रतीत होता है कि बुद्ध तमाम सांसारिक विमाहों से मुक्त होकर अर्न्तमुखी हो गये हैं। चुनार के बलुआ पत्थर में बनी यह मूर्ति कलात्मक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस प्रतिमा में बुद्ध को सिल्क की तरह पारदर्शी चीवर में दिखाया गया है, जिसमें उनकी सम्पूर्ण काया परिलक्षित होती है। प्रतिमा पर अंकित चीवर तत्कालीन बनारस के सिल्क की याद दिलाता है। चीवर के नीचे शरीर की सुडौलता दर्शनीय है। अण्डाकार सुकोमल सिर के पार्श्व भाग में वृत्ताकार प्रभामण्डल है, जिस पर कमल की बेल व मोतियों की माला का एक वृत्त में अलंकरण है। इन संकेन्द्रीय वृत्तों की गति को ऊपर अंकित दो गन्धर्वों ने जैसे रोक सा दिया है। एक आयताकार पीठिका पर सम बाहु त्रिभुज के रुप में बुद्ध आकृति के पीछे वृत्ताकार प्रभामण्डल का ज्यामितीय अंकन सारनाथ के प्रभावशाली कला की अभिव्यक्ति है इस कला ने वृहत्तर भारतीय मूर्तिकला को एक नया आयाम प्रदान किया है

    इसी प्रकार की वैरोचन बुद्ध की प्रतिमा बोरोबुदूर (जावा) के स्तूप हैं जिनमें बर्फीदार जालियों का अलंकरण है। ये सभी तीन संकेन्द्रीय वृत्तों में संयोजित है। प्रत्येक स्तूप में बुद्ध धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में बज्रपर्यकासन में बैठे हुए हैं। ये सभी प्रतिमाएं समबाहु त्रिभुज में संयोजित है। शरीर की कोमलता भी सारनाथ की बुद्ध मूर्ति की तरह ही है। इन मूर्तियों के वस्त्र भी पारदर्शी स्तूप की प्रतिमा की बनावट में कोई फर्क है तो वह है चेहरे के आकृति की भिन्नता। यहां चेहरा जावा के जातीय स्वरूप जैसा है। इसके अतिरिक्त शारीरिक बनावट व मूर्तिशास्त्र की दृष्टि से ये प्रतिमाएं सारनाथ में बनी मूर्ति जैसी ही हैं।

    सारनाथ में कुमार गुप्त द्वितीय व बुद्धगुप्त के काल में बुद्ध की खड़ी प्रतिमायें भी बनी थीं। विश्व प्रसिद्ध अजन्ता की गुफाओं में गुफा सं0 19के आगे वाले हिस्से पर बनी बुद्ध की खड़ी प्रतिमा पर सारनाथ का प्रतिमाओं का सीधा और स्पष्ट प्रभाव दिखाता है। इन गुफाओं को वाकाटक राजाओं ने बनवाया था। वास्तव में सारनाथ की प्रतिमायें अपने समय के भारतीय बौद्ध मूर्तिकारों के लिए ‘माडल’ के रूप में थीं ये अजन्ता से होकर समुद्र मार्ग से श्रीलंका होते हुए बोरोबुदूर जा पहुंची। सारनाथ की मूर्तियों के कटिभाग की बनावट बोरोबुदूर की प्रतिमाओं में भी मिलती है। इसके विषय में विद्वानों का मत है कि यह भारतीय नृत्यका से ली गई है लन्दन के ब्रिटिश म्यूजियम में संग्रहित सारनाथ से प्राप्त भद्रासन में बैठी एक बुद्ध प्रतिमा का हाथ धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में है। इसी प्रकार की एक प्रतिमा अजंता की गुफा सं0 16 में बने स्तूप पर भी अंकित है। इसी शैली पर चण्डी में दूत तथा जावा की 9वीं-10वीं शदी की कांस्य बुद्ध प्रतिमा बनी। प्रसिद्ध विद्वान त्रय ओ0सी0 गांगुली, डी0पी0 घोष व हाल्ट के प्रभाव का परिणाम माना है। सारनाथ की यह मूर्ति शैली किस प्रकार अजन्ता से होते हुए जावा पहुंची, इसके विषय में विचारकों का मत है कि व्यापार, विवाह और धर्मप्रचार के लिए भारत आने वाले लोग जब लौटते थे, तब अपने साथ मूर्तियों की छोटी प्रतिकृतियां ले जाया करते थे। उस काल में भारतीय राजकुमार इण्डोनेशियाई कन्याओं से विवाह करते थे। जावा में भारतीय बस्तियों के माध्यम से धर्म और तकनीक का खूब प्रचार होता था। इसके अतिरिक्त जावा में ब्राह्मणों ने भारतीय धर्म और कला का खूब प्रचार प्रसार किया। कश्मीर का गुनवरमन नामक राजकुमार सुवर्ण द्वीप गया था वहां उसने बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया।

    नालन्दा से धर्मपाल नामक विद्वान भी इण्डोनेशिया गये थे। गोंड के राजकुमार घोष, बज्रबोधि एवं अमोधबज्र नामक व्यक्ति भी चीन जाते हुए विजयद्वीप में ठहरे थे। इतशिंग के अनुसार श्री विजय द्वीप नामक स्थान महायान व संस्कृत विद्या का महत्वपूर्ण केन्द्र था। इसी स्थान से भारतीय कला का प्रवेश इण्डोनेशिया में हुआ था। इण्डोनेशिया के तीर्थयात्री भी भारत आया करते थे, जिसे देव भूमि कहा गया है। इस बात की पुष्टि देवपाल नामक पालवंशीय राजा के नालन्दा चार्टर द्वारा होती है।

    जब भी विद्वान, विद्यार्थी, तीर्थयात्री भारत आते थे तो वापस जाते समय अपने साथ संस्मरण के लिए प्रस्तर व कांश्य प्रतिमाएं ले जाते थे। ये गुजरात के कच्छ बंगाल के ताम्रलिपि व उड़ीसा के पल्लूर बन्दरगाहों द्वारा वापस जाते थे। ये गुजरात के कच्छ बंगाल के ताम्रलिपि व उड़ीसा के पल्लूर बन्दरगाहों द्वारा वापस जाते थे। बौद्ध मण्डल उपासना में विश्वास रखने वाले व्यक्ति एक प्रतिमा ही नहीं, बल्कि बज्रयान और तंत्रयान से सम्बद्ध सभी देव परिवारों की प्रतिमाएं अपने साथ ले जाते थे। यही कारण है कि सारनाथ शैली का प्रभाव बौद्ध प्रतिमा विज्ञान की जटिलताएं जावा द्वीप में बड़ी आसानी से मिल जाती है। आरम्भ में वाकाटक व पाल कला सारनाथ शैली से प्रभावित हुई, उसके बाद इसका प्रभाव 9वीं शती में जावा की कला पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगा। इस प्रकार वाकाटक व पाल मूर्तिकला बृहत्तर भारत में सारनाथ शैली के प्रचार-प्रसार की मजबूत माध्यम बनी। इसी प्रकार सारनाथ काशी की कला न केवल काशी के लिए महत्वपूर्ण है, अपितु इसकी कला चेतना समस्त भारतवर्ष के लिए प्रेरणा का स्रोत रही है। वास्तव में सारनाथ-काशी की बौद्ध कला का कालजयी इतिहास भारतीय कला के इतिहास में एक गौरवपूर्ण अध्याय है।

                                                                                                      -मधु ज्योत्सना

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