बनारस को बताया नहीं जा सकता है – पं० धर्मशील चतुर्वेदी

आप उन्हें साहित्यकार कहिये, व्यंगकार कहिये, अधिवक्ता, चित्राकार, नाटककार या जो कुछ भी, वह सभी भूमिकाओं में समान सक्रियता से मिलेंगे क्योंकि मूलतः वह बनारसी हैं। यदि उन्हें सात वार नौ त्योहार की बनारसी परम्परा का ध्वजावाहक कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। ठलुआ क्लब, उलूक महोत्सव, महामूर्ख सम्मेलन जैसे तमाम अनोखे आयोजनों को आयोजित कर श्री धर्मशील चतुर्वेदी बनारसीपन की संस्कृति को जिंदा रखे हुए हैं। बनारसीपन को जी रहे लोगों से मिलने की श्रृंखला में श्री चतुर्वेदी ने अपने ही अंदाज में खुलकर बातचीत की-

अपने बारे में बताएं? कब लगा कि आप   बनारसीपन में रम गये हैं?

अपने बारे में हम क्या बताएं (हँसते हुए) हम तो बेढंगे आदमी हैं। इतने क्षेत्रों में काम करते हैं कि कहां से शुरू करें। मैं शुरू से मेघावी छात्र नहीं था। विश्वविद्यालय में आकर मेघावी हुआ, नहीं तो प्रारम्भ से बेढंगा ही था। इस बेढंगेपन की शुरूआत होती है अगस्त महीना सन् 1942 में जब मैं सनातन धर्म इण्टर कालेज में कक्षा-3 में पढ़ता था उसी समय सनातन धर्म से एक जलूस निकला और एक छात्र सिविल कोर्ट के बिल्डिंग से यूनियन जैक उतारकर तिरंगा लहराया। वह कक्षा 9 का छात्र था। उस घटना का मुझ पर बड़ा प्रभाव पड़ा। हमारा संस्कार बनारसी था। पिता और दादा जी दोनों बनारसी थे। दादाजी वैदिक विद्वान थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय कालेज के वेद कर्मकाण्ड विभाग के अध्यक्ष थे। पिताजी साहित्य से सम्बन्धित थे। वो बनारसी मिजाज के नहीं थे। उनका अध्ययन मुजफ्फर नगर में हुआ था। हम तो काशी के उस मुहल्ले में रहे जिसको कहा जाता है “हड़हा, पियरी, जतन क बरी, तीनों गुण्डन के घर” हम तो पियरी के हैं, सो वह संस्कार तो आना ही था। मेरे जीवन के साथ बड़ी विचित्र-विचित्र घटनाएं है। (हँसते हुए) 1934 में ही भयानक भूकम्प आया, मेरे जन्म के आगे-पीछे काशी के जितने विद्वान थे सबका निधन हो गया था, द्वितीय विश्वयुद्ध भी हुआ। उसी सब बेढ़ंगेपन का असर था कि हाईस्कूल तक मैं एक लद्धड़ विद्यार्थी था। कई बार फेल हुआ, निकाल दिया गया। घूम-घूमकर मैंने पढ़ाई की। सेंट्रल गर्ल्स स्कूल से किण्डर गार्टन की पढ़ाई हुई। सनातन धर्म में 3 कक्षा से 6 तक पढ़े वहां फेल हुए तो हरिश्चन्द्र में आये। आठ में फेल हुये तो नवीं में डी0ए0वी0 कालेज चले गये।

यहां ताजमहल तो है नहीं। पर्यटक इन्हीं गलियों घाटों वाले शहर को देखने आते हैं, इसे ऐसे ही रहने दें। यह गलियों का शहर है, यहां मेट्रो चलाकर क्या मिलेगा। यहां जिन्दा रहने की संस्कृति है। लोगों ने पैदल चलना बन्द कर दिया 90: लोग डायबिटिक हो गये पहले साधन नहीं था सब पैदल चलते थे, रोग मुक्त होते थे। सड़के चौड़ी करने की क्या आवश्यकता है? यहां तो जगह-जगह पर इतिहास है कहीं मन्दिर, धर्मशाला ट्रस्ट है; पुराना भवन मिलेगा। यह बुल्डोजर चलाने वाला शहर नहीं, हथौडे, छेनी वाला शहर है। यहां पग-पग पर इतिहास मिलेगा।

इण्टर के बाद सारे डिवीजन मेरिट के हो गये। बी0एच0यू0 से पहला एम0ए0 पुरातत्व से किया दूसरा एम0ए0 काशी विद्यापीठ से समाजशास्त्र से किया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पी0एच0डी0 कर रहा था तो 1958 में आंदोलन हो गया और सदा के लिए निष्कासन हो गया। गोरखपुर से बी0एड0 किया। फिर अचानक बी0एच0यू0 का निष्कासन मेरे द्वारा एक क्रान्तिकारी पत्र वाइस चांसलर जस्टिस भगवती को लिखने पर रोक दिया गया ओर इस तरह मुझे लॉ की आखिरी वर्ष की परीक्षा देने को मिल गयी। (उस समय डबल कोर्स साथ में कर सकते थे) और वकालत की शुरूआत हो गयी। 1961 में रजिस्ट्रेशन हुआ- अधिवक्ता के तौर पर। 1965 में समाजशास्त्र से एम0ए0 किया पर काले कोट ने पीछा नहीं छोड़ा। वकालत के साथ-साथ हमने पत्रकारिता भी की और जनवर्ता अखबार में 1972 में पहले दिन से लिखने लगा। 200 रुपया मानदेय मिलता था जिससे जीविका चलती रही। 1978 में मोरारजी के सरकार में मैं सरकारी वकील बना और 18 साल सरकारी वकील रहा इस दौरान पत्रकारिता भी की, पर नुकसान यह हुआ कि लेखन छद्म नामों से करना पड़ा। जनवार्ता में अष्टावक्र नाम से लिखा जिसकी वजह से लोग मुझे आज भी लेखक, कहानीकार नहीं मानते। इस प्रकार बड़ा आनन्दपूर्ण मेरा जीवन रहा है और यह मेरा सौभाग्य है कि मैं इतने कार्य एक साथ करता हूँ। मैं रिटायर नहीं होना चाहता। इसके अलावा 1953 से चित्रकला में डिप्लोमा किया ‘काशी की चित्रशैली’ नामक विधा प्रारम्भ की जिसमें रामचन्द्र शुक्ल, उमाशंकर पाण्डेय, कमल सिंह थे। कई जगह प्रदर्शनी लगाई। इसकी धर्मयुग अखबार में भी चर्चा थी। एक पत्रिका चित्रकला की ‘रूपरंग’ निकाली। कई दिग्गजों ने पत्रिका की प्रशंसा की, पर संसाधनों की कमी के वजह से बन्द हो गयी। 1960 से आज अखबार में मोहनलाल गुप्त जी के कहने पर गद्य में हास्य लिखना शुरू किया और आज तक चल रहा है। बचपन में अभिनय की भी रुचि रही। लखनऊ का रंगमंच, रवीन्द्रालय, दिल्ली तालकटोरा गार्डन पर अभिनय किया। इस प्रकार कवि सम्मेलन, संगीत सम्मेलन में भी भागीदारी रही। पता नहीं कितने उलुल-जुलूल काम मैंने किया पर, मुझे बेढंगा करने में अच्छा लगता है।

बनारसीपन की वह कौन सी बात है जिसने आपको प्रभावित किया?

बनारसीपन है-

     “चना चबैना गंग जल जो पुरवे करतार। 

     काशी कबहुं ना छोड़िये विश्वनाथ दरबार।।”

अब बनारसीपन का क्या कहें, मैं घर से 25 साल तक बिना पैसे के निकलता था और लौटता था तो 25 बीड़ा पान खाकर लौटता था। 25-25 चाय पीता था। विश्वविद्यालय में तो हमने “चूनिस्ट क्लब” बनाया था और तय किया था कि पैसे जेब में हो तब भी खर्च नहीं करना है जो मिल जायेगा उसे चूना लगाना है। इसके सदस्य सुभाष झा भी थे जो रणजी ट्राफी क्रिकेट के खिलाड़ी थे। रोज हम 5-6 लोग सुबह से कमर तोड़ने के लिए आदमी खोजते थे। बनारस की यही मस्ती निश्चिंतता ही बनारसीपन है।

बनारस सात वार, नौ त्यौहार का शहर रहा है, धीरे-धीरे कुछ चीजें छूटती जा रही हैं? (तमाम मेले आयोजन) इनको बचाने के लिए क्या प्रयास हों?

चीजें खत्म हो रही हैं तो शुरू भी तो हो रही हैं। पहले देव दीपावली कहां होती थी। हमने नारायण गुरु के साथ शुरू किया। हां! बहरी अलंग अब नहीं बचा। बनारस का बहरी अलंग अहरौरा में लखनिया दरी तक था। इक्का जहां तक चला जाये वहां तक बहरी अलंग था। रथ यात्रा का हिस्सा भी बहरी अलंग था, नाटी इमली में तमाम बगीचे थे, मोतीलाल जी का बगीचा था, ये सब बहरी अलंग के बगीचे थे। सारनाथ, बड़ी गैबी, लक्सा तक पहले आबादी ही नहीं थी। अब तो बहरी अलंग बचा ही नहीं।

ठलुआ क्लब, बुढ़वा मंगल, महामूर्ख सम्मेलन जैसे आयोजनों के पीछे क्या दर्शन रहा है?

सात वार-नौ त्यौहार को पूरा करने के लिए हमने यह प्रारम्भ किया। मेरा दर्शन यही है कि काशी की मौज-मस्ती कायम रहे लोगों को आनन्द मिलता रहे। नीरसता जीवन में ना आये। रीडर्स डाइजेस्ट में लिखा है कि ‘अगर आप अवसाद के शिकार हैं तो फौरन एक आदमी को मित्र बनाएं। इसका मतलब साथ मिलें, मनुष्य सामाजिक प्राणी है जो वर्तमान में, कम्प्यूटर और आधुनिक संसाधनों के बीच एकाकी हो गया है, इस प्रकार हास्य के माध्यम से मेरा संजीवनी देने का उपाय है। महामूर्ख सम्मेलन में आये 20,000 लोगों को देखकर लगता है कि मैं इन्हें आनन्द के माध्यम से जीवन दे रहा हूँ। मैं कहता भी हूँ कि यह परिवार का आयोजन है, हमें सिर्फ आनन्द से मतलब है।

ठलुआ क्लब के इतिहास पर थोड़ा विस्तार से बताएं?

बाबू गुलाब राय एक बहुत बड़े निबन्धकार थे। आगरा में उन्होंने ठलुआ क्लब बनाया। बनारस में 1955 में विश्वनाथ मुखर्जी, डॉ0 भानु शंकर मेहता, पिता जी, बेढ़ब बनारसी, माधव प्रसाद मिश्र, मोहन लाल गुप्त इन लोगों ने आई0एम0ए0 के बिल्डिंग में गोष्ठी करते थे जिसमें सुमित्रानन्द पन्त, महादेवी वर्मा, बिस्मिल्लाह खान आते थे। इसके स्वागत करने को “मुण्डन” कहा जाता है। जिस व्यक्ति का मुण्डन होता है उसे उसकी कमियां बताई जाती हैं इस क्रम में कलकत्ता में सीताराम सैरसय्या का मुण्डन किया। उस्ताद अलाउद्दीन खां (रविशंकर जी के गुरु) का मुंडन मैहर में हुआ। इस प्रकार ठलुआ क्लब में बड़ी-बड़ी विभूतियों का मुंडन किया गया। यह ‘फटीचर’ पत्रिका में प्रकाशित भी है। वर्तमान में प्रमोद शाह, विनय कुल द्वारा चलाया जा रहा है। कुछ दिन पहले हमारा मुंडन हुआ था। दीनानाथ झुनझुनवाला का हुआ अभी काशी में बहुत से लोग लालायित हैं मुंडन के लिए।

युवा साहित्यकारों को मंच देने के लिए क्या प्रयास किये जा रहे हैं?

युवा साहित्यकारों का हमारे शनिवार गोष्ठी में स्वागत है। महामूर्ख सम्मेलन में भी हमने तय कर लिया है कि सिर्फ युवा हास्य कलाकारों का ही बुलाया जाये। अब तो हास्य भी ‘अर्थ’ प्रधान हो गया है। पहले बेढब जी, हमारे पिता जी श्री सीताराम चतुर्वेदी रमई काका ये लोग हिन्दी के प्रचार के लिए मिशन के तौर पर कवि सम्मेलन में जाते थे। लेकिन अब ये व्यवसाय हो गया। इसलिए हमने तय किया कि नये लोगों को बुलाएंगे। आखिर हँसा ये भी लेते हैं, हँसा वो भी लेते हैं, तो क्यों हम फालतू का व्यय करें।

बनारस के साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के वर्तमान स्थिति पर आपका क्या दृष्टिकोण है?

संस्थाएं तो दरिद्रता की स्थिति में पहुंच गई हैं। चाहे जिस संस्था का नाम लें! नागरी प्रचारिणी सभा हो, भारत धर्म महामण्डल; सब बन्द। अब शराब वाली संस्थाएं चल रही हैं। इनका कोई उद्देश्य तो है नहीं, आई कैम्प लगवा दिया, चन्दा 10 -12 हजार सलाना होता है उसी से बैठक में शराब होगा, गपशप होगी और भोजन होता है। जहां कविता सुनाने का कोई औचित्य नहीं। ऐसे भुक्खड़ आयोजन के लिए मैं स्पष्ट मना कर देता हूँ।

साहित्य परम्परा से विद्वत्ता खत्म हो गई। सब कुछ सतही हो गया है। इसके लिए लड़ाई लड़नी होगी। जैसे-राज्य हिन्दी संस्थान द्वारा युवा साहित्यकारों को प्रोत्साहन क्यों नहीं दिया जाता? अनुदान दिया जाए। 92 साल, 95 साल के लोगों को यश भारती और अन्य पुरस्कार देने का क्या मतलब है? मेरे पिता जी को 95 साल की उम्र में हिन्दी संस्थान ने अलंकरण दिया। अब वो क्या देंगे? युवाओं को पुरस्कार दें। हिन्दी के लेखक कवि की स्थिति यह है कि वह किताब छपवाता है तो बेचने वाला कोई नहीं, उसे बांटता है। तो इसके लिए संस्थाओं को बाध्य किया जाय कि रचनाकारों की कृति को छपवाएं, सरकारी तंत्र, नगर की समृद्ध संस्थाएं इसके लिए प्रयास करें।

बनारस सर्वविद्या की राजधानी रही है पर वर्तमान में साहित्य के खजाने यानी पुस्तकालय धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं। उन्हें किस प्रकार बचाया जाये या क्या प्रयास किये जायें?

जितनी दुर्दशा काशी में पुस्तकालयों की हो रही है, उतनी दुर्गति तो यहां के सड़कों की भी नहीं है। मैंने बचपन में अपने यहां बाल पुस्तकालय खोला। लोगों को पढ़ने का क्रेज था। आज अभिमन्यु पुस्तकालय का हाल देख लीजिए, करमाइकल लाइब्रेरी पर जालान ने कब्जा कर लिया, उससे दुर्भाग्यपूर्ण, सरकारी डिस्ट्रीक्ट लाइब्रेरी की है जो अर्दली बाजार में है। किताबें सड़ रही हैं। नागरी प्रचारिणी सभा में बिजली नहीं, कोई पढ़ नहीं पाता, लोगों ने भी जाना बन्द कर दिया। वाचनालय तो बचा ही नहीं, आपसी हित, राजनीति के शिकार हो गये पुस्तकालय। सम्पूर्णानन्द के सरस्वती भवन में अथाह साहित्य भरा है। इसके लिए पुस्तकालय आन्दोलन चलाना चाहिए। सड़क, बिजली आन्दोलन के लिए युवा आते हैं पुस्तकालय के लिए कोई नहीं आते। पहले नगर निगम, यूपी सरकार पुस्तकालयों को अनुदान देती थी। अब क्या उपयोगिता खत्म हो गई? फिजूल कामों के लिए अनुदान देते हैं पुस्तकालयों के लिए दें। लाइब्रेरी फीस विद्यालयों में ली जाती है पर लाइब्रेरी है ही नहीं।

वर्तमान समय में बनारस के विकास की तमाम बातें की जा रही है? आपके दृष्टिकोण में विकास सम्बन्धी क्या पैमाने होने चाहिए? खासकर घाट, गलियों, गंगा के संदर्भ में?

हमारा कहा मानें तो सारा विकास वरुणा के पार या महमूरगंज के आगे करना चाहिए। शहर को छेड़ना ही नहीं चाहिए, गोदौलिया में अंडरग्राउंड पार्किंग बनवाने का प्रस्ताव आया है अब यह मजाक नहीं तो क्या है? आखिर यहां ताजमहल तो है नहीं! पर्यटक इन्हीं गलियों, घाटों वाले शहर को देखने आते हैं। इसे ऐसे ही रहने दें यह गलियों का शहर है, यहां मेट्रो चलाकर क्या मिलेगा? यहां जिन्दा रहने की संस्कृति है। लोगों ने पैदल चलना बन्द कर दिया बहुतायत लोग डायबिटिक हो गये। पहले साधन नहीं था सब पैदल चलते थे, रोग मुक्त होते थे। सड़कें चौड़ी करने की क्या आवश्यकता है? यहां तो जगह-जगह पर इतिहास है। कहीं मन्दिर, धर्मशाला ट्रस्ट है कहीं पुराना भवन मिलेगा। यह बुल्डोजर चलाने वाला शहर नहीं, हथौड़े, छेनी वाला शहर है। यहां पग-पग पर इतिहास मिलेगा। विकास काशी के परिधि के बाहर करें। इंजीनियरिंग वाले धर्म, आध्यात्म को क्या जानें। यहां लोग देखने नहीं बनारस जीने आते हैं। काशी जीवन जीना है। हिप्पी आन्दोलन 1962 में जो अमेरिका में हुआ वहां का आक्रोशित युवा यहां आकर शांति अनुभव करता था। अगर शांति के लिए यहां आते हैं तो उनको जीने दीजिए।

मन्दिरों, कुण्डों, तालाबों (काशी खण्डोक्त) पर अतिक्रमण हो रहा है। उनके संरक्षण व अवमुक्ति के लिए किस तरह के प्रयास हों?

इसके लिए जो प्रयास कर रहे हैं उनको सहयोग देने की जरूरत है। कुण्डों, तालाबों के लिए सुरेन्द्र नारायण गौड़ जी प्रयास कर रहे हैं उनका सहयोग हो। यह शासन इतना निकम्मा है कि उच्च न्यायालय के आदेश को भी नहीं मान रहा। सारी संस्कृति को तहस-नहस करने पर लगा है। अब टाउनहाल में मल्टीस्टोरी पार्किंग की क्या जरूरत है? कारवालों की सुविधा के लिए यह शहर है? हवा नहीं चाहिए? अमेरिका, इंग्लैण्ड में कहा जाता है कि पार्क शहर का फेफड़ा होता है, आज हम फेफड़े की हत्या कर रहे हैं। मछोदरी पार्क, बेनियाबाग पार्क, कम्पनी बाग टाउनहाल को घटाते जा रहे हैं। किसी को कोई होश नहीं। एक दिन सब बीमार हो जायेंगे। पर कोई प्रयास नहीं कर रहा।

आपकी इतनी सारी गतिविधियाँ साथ-साथ रहती हैं इतनी ऊर्जा कहां से प्राप्त करते हैं? इसके पीछे रहस्य?

बनारस की मस्ती ही मेरी ऊर्जा है। मेरे पास संचित धन नहीं है। मैंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कह दिया कि सांड़ बनारसी को मेरे मृत्यु का, दवा इत्यादि का बोझ मैं दे रहा हूँ। मैंने अपना बीमा नागरिकों के नाम कर दिया है। कोई लालसा नहीं है, यही मेरी ऊर्जा है।

नये व्यक्ति को बनारसीपन किस तरह से बताया जाये?

बनारस बताने की नहीं महसूस कराने की चीज है, उसे महसूस कराना होगा। बिना पक्के महाल गये, पान खाये कोई बनारसीपन को नहीं जान सकता। बनारस में कर्फ्यू आर्डर रहता है और बनारसी पक्के महाल में घूमता रहता है, यह यहां की विशेषता है, तो इसे दिखाना होगा। बनारस बताया नहीं जा सकता।

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