अखाड़ा वृद्धकाल- वाराणसी

 मैदागिन चौराहे-दारानगर वाली सड़क से जुड़ी दाहिनी ओर घूमने वाली सड़क, जो महामृत्युंजय मन्दिर तक जाती है। हर बनारसी यहाँ मनोकामना के लिए आता है। यहीं अखाड़ा वृद्धकाल है। मन्दिर के पण्डा जी इसके संचालक हैं। अखाड़ा अत्यन्त प्राचीन है और मन्दिर के अन्दर हैं पहले यहाँ कुश्तियों की सरगरमी रहा करती थी। ‘साँकड़े’ वाली जोड़ी यहाँ की देन है। इसे फेर सकना सबके वश की बात नहीं, जो भी इसे फेरा हैं ईटों की सहायता से। लेकिन केदारनाथ दीक्षित ने इसे सामान्य रूप से फेर कर ख्याति अर्जित की। तेजप्रताप की उस्तादी में भारत सिंह, काली चरण, मेवा, मुन्ना, प्यारे शिवशंकर सरदार आदि ने प्रसिद्धि पाई। मलखम में राजकुमार को तो ‘बनारसबाज’ की उपाधि मिली। शीशा वाली जोड़ी को बनारस ने खूब फेरा। आज यहीं जोड़ियों का अखाड़ा बन गया है। कुश्तियों वाला जमाना तो कुछ और था।

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