मृत्यु का प्रतीक्षालय नहीं मोक्ष की जननी है काशी – पद्मश्री डॉ० राजेश्वर आचार्य

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बचपन से ही मेधावी डॉक्टर राजेश्वर आचार्य ने 12 वर्ष की उम्र में ही काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संगीत व मंच कला संकाय में दाखिला प्राप्त कर लिया। गायन और वादन दोनों विधाओं में पारंगत डॉक्टर राजेश्वर आचार्य गोरखपुर विश्वविद्यालय में संगीत विभाग के विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। चैती, ठुमरी, कजरी एवं जलतरंग के सशक्त हस्ताक्षर डॉक्टर राजेश्वर आचार्य बनारस तथा बनारसी पन के जीवंत प्रतिरूप हैं। संगीत के क्षेत्र में आपके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए, आपको वर्ष 2019 का पद्मश्री पुरस्कार दिया गया। प्रस्तुत है डॉक्टर राजेश्वर आचार्य से काशी कथा टीम की हुई बातचीत के प्रमुख अंश…

संगीत की शुरूआत आपके जीवन में कब हुआ?
सबसे पहला तथ्य जो अनन्त है इसका अनादि होना आवश्यक है। जितना भी अनन्त है जो खत्म नहीं होता तो आरम्भ का प्रश्न ही नहीं है। जन्मतः जीव जगत को वोकल कार्ड मिला (वाक् तन्तु) किसी भी गति का परिणाम ध्वनि है इसलिए व्यक्तित्व की पहली अभिव्यक्ति ध्वनि है। हमारे संदर्भ में यदि देखा जाए तो मैं मात्रविहीन बालक था। महामना मालवीय से हमारा परिवार पूर्वजों से संबंधित था। हमारे दादा उनके मित्रों में से थे। पिता जी उनको बाबू कहते थे। महामना सबको संकल्प देते थे। जैसे पिताजी ने अंग्रेजी में टाॅप किया उस समय कापियाँ क्लास में पढ़कर सुनाई जाती थी। पिता जी को 100 में 60 अंक मिले थे और उनके एक मित्र को 100 में 74 अंक मिले थे। कापियाँ पढ़ी गयी लेकिन टाॅप पिताजी ने किया था। हुआ यह था कि पिता जी इक्का से जा रहे थे और उनकी दुर्घटना हो गयी इसकी वजह से वह परीक्षा में डेढ़ घण्टा लेट पहुँच और तीन प्रश्न ही कर पाये। मालवीय जी ने उन्हें बुलाया और कहा आज के बाद इंग्लिश पढ़ना, लिखना, समझना पर बोलना मत और इंग्लिश में एम0ए0 मत करना। पिता जी ने मन में प्रश्न के साथ इसे स्वीकार किया मालवीय जी ने कहा देखो अंग्रेजी के लिए काम करने वाले बहुत है पर विश्वविद्यालय की ऐसी प्रतिभा अगर हिन्दी और संस्कृत में रहेगी तो अच्छा काम होगा। इस प्रकार मेरे पिता पण्डित पद्म नारायण आचार्य काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हुये। मैं तीन महीने का था तो द्वितीय पुत्र के नाते बाबू (महामना) के गोद में रखा गया उन्होंने कहा हमने विश्वविद्यालय तो खोल दिया है पर हमारी जो शिक्षा की आर्ष पद्धति थी कैसी थी कौन सी थी इसके लिए जब तक तुम खुद नहीं जुड़ोगे तब तक नहीं जानोगें। तुम इसे स्कूल मत भेजना। पाँच साल की अवस्था तक मेरी माता जी गुजर गयी मैं स्कूल भी नहीं भेजा गया। घर में संगीत का वातावरण था पिताजी सुरीले थे। माँ और मामा जी भी गाते थे। मैं भी उनके गाये गानों का अनुसरण करता था। एक बार पण्डित ओमकार नाथ ठाकुर ने नागरिणी प्रचारिणी सभा में कामायनी की सस्वर प्रस्तुती दी तो मैंने सुनकर उनकी नकल की । तब उन्होंने मुझे बी0एच0यू0 में प्रवेश दिलाया अब यह नैतिक सवाल आया कि 10 का बच्चा बी0एच0यू0 में आई कार्ड लिये कैसे घूम रहा है। उसी समय सम्पूर्णानन्द जी में नारी शिक्षा को बल देने के लिए हाईस्कूल में कक्षा 8 की परीक्षा के सर्टीफिकेट की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। इस तरह मैंन बी0 म्यूज और डाॅक्टरेट किया और कई सब्जेक्ट में इण्टर डिसीप्लीनरी (अंर्तविषयी शोध) रिसर्च किया फिर मैं पढ़ाने गया तो संगीत को विश्वविद्यालय बड़े हेय दृष्टि से देखा जाता था। म्यूजिक एवं फाइन आर्ट को बैनर पोस्टर लिखने वाला विभाग और बैण्ड पार्टी समझा जाता था। मैं संगीत के सामने तो तिनका भी नहीं हूं पर जब संगीत का प्रतिनिधी बनाया जाऊँगा तो इस आकाश से भी विराट मेरा अहंकार होगा। विश्वविद्यालय के प्रो0 को मैं चुनौती देता हूं कि आप जितने विषय में है मैं उसमें संगीत खोज के दिखायें दूंगा आप अपने विषय में संगीत खोज के दिखाई कोई भी विषय छोटा नहीं होता।

संगीत से आपको क्या सीखने को मिला?
संगीत सीखने के लिए आपको विद्यार्थी भाव के पात्रता की परिक्षा देनी होगी कि आप सीखने लायक है कि नहीं मुझे कोई विद्वान कहता है तो लगता है जैसे गाली दे रहा है। क्योंकि विद्वान के नाम पर ऐसे लोगों को देखा है जो दूसरे लोगों को छोटा समझते है मुझे यह समझ आया कि ‘उस देश का भविष्य खोटा होता है। जहाँ बड़ो की निगाह में नौजवान छोटा होता है।’ इस दृष्टि से मेरी संगीत यात्रा शैक्षिक जगत के चेतना रुपांतरण के साथ है। जैसे स्वतंत्रत का मतलब व्यवस्थाहीन न होकर, मेरी बनाई हुई व्यवस्था है। अतः संगीत में मैंने जो जाना समझा वह संगीत ही है। लोग मुझे विविध विषय का ज्ञाता समझते है। पर मैं तो सब दरवाजे पर संगीत खोजने गया लेकिन लोगों ने मुझे उसी घर का सदस्य समझ लिया मेरी यात्रा संगीत से संगीत तक ही है। मेरा गायन, वादन, शैलीगत विशेषता धुप्रद ख्याल सब कुछ।

संगीत में समीक्षा और आलोचना पर आपकी क्या राय है?
वास्तव में संगीत में समीक्षा में आलोचना का अभाव है। पाँच साल के बच्चे से लेकर पच्चासी के वृद्ध तक कुछ शब्द उछाले जाते हैं। भाव विभोर कर दिया, मंत्र मुग्ध कर दिया, जादू सिर चढ़कर बोला, अब कलाकार भी यही चाहते है और पत्रकार भी नास्ता पानी करके यही छाप देते है। एक कहानी है ऊँट के ब्याह में गदहा गया गदहे ने ऊँट से कहा तुम बहुत सुन्दर हो तो ऊँट खुश हुआ और गदहे ने गाया तो ऊँट ने कहा तुम बहुत अच्छा गाते हो। ‘अहो रूपम् अहो धनी’ यही हालत आज है। पचास साल पहले जब किसी को बजारू कह दिया जाता तो मारपीट हो जाती और आज मार्केट क्रियेट किया जाता है अब कोई कैसे समझाएं कि बाजार में मकान खरीदा जा सकता है ‘घर’ नहीं। संगीत में ‘‘मैं’’ का प्रभुत्व हो गया संगीत से ख्याति चाहिए, पैसा चाहिए, लेकिन संगीत नहीं चाहिए।

संगीत और बनारसीपन को आप कैसे देखते है?
काशी की प्रतिष्ठा और तिष्ठा इसीलिए है यहाँ शंकर का जन्म दिन नहीं मनाये जाता बल्कि विवाह दिवस मनाया जाता है। वह देव नहीं महादेव है। ‘वन्दे नाद तनु’ वह महान संगीतकार नहीं स्वयं में संगीत है। जब आपको शक्ति मिलती है और आप सक्रिय होते है तभी श्रीगणेश होता है। इसके युति से आप शिवत्व की ओर चलते है। इसी तरह काशी में फक्कड़ और अख्खड़ (अख्खड़ शब्द अखाड़े से बना है।) जब आप दोनों बन जायेंगे तब आप धाकड़ बनेंगे। जो इन तीनों को अपनाता है वह मस्त रहता है। काशी का व्यक्ति कहता है कि गमछा गया तो गम छा गया व निवृत भी रहता है और प्रवृत भी होता है। (तमाशा घुसके देखता है।) जैसे भोले बाबा का कस्टूयम नहीं है वैसे ही हर कोई गमछा लंगोट पहने मस्त रहता है। यहां देवत्व का खुला ऑफर है। पाखण्ड का खण्ड-खण्ड करें व शिवता है। भला है तो लाभ भी होगा। उसका वादा करोगे तो हर चीज पर दावा करोंगे और दया करोंगे तो याद रहोगे। बनारस में कुछ ऐसी चीज है।

बनारस में अड़ीबाजी की भी परम्परा रही है?
यह एक तरह से गंगा के किनारे मानसिक स्नान है इसमें दो पक्ष होते है तर्क होता है कुतर्क होता है। अध्यापक छात्रों दुकानदारों की अड़ी लगती है। यहां सार तत्व और निसार तत्व को समझा जाता है। अब देखिए निवृत या निपटान शब्द का दार्शनिक मूल्य है जैसे जुडे़ तो जीवनभर के लिए और छोड़ो तो जैसे कभी था ही नहीं। इस पर यही कहना है।

” जब किसी ओट से किसी ने चोट मारी।
दर्द से हुई अपनी रिश्तेदारी।।
मैं तो दिन-रात दर्द – ए-बारात लिये चलता हूं।
आ जाये बेवा तकलीफे या खुशिया कुंवारी।। ”

यहाँ समग्र चेतना उदात्त भाव पर रहती है। जहां ऊँची से ऊँची डिग्री मिलने पर भी मानवीयता नहीं बढ़़ती वहीं काशी मंे सामान्य आदमी भी उस शिखर पर बैठकर सामान्य रहता है। यहां सामान्य में ही विशिष्टतायें है। लस्सी पी के पुरवा फेंक देने पर दुकानदार मना कर देता है कि ‘दुबारा हमरे दुकान पर मत आया गोरस गोड़े पर पडी न! पानी लेके पीले होता पुरवा में इ कौन तरीका हव’ यहीं कंकर-कंकर, शंकर का भाव है। काशी में पढ़ने सब आते हैं। काशी को पढ़कर देखिए। यहां विद्वत्ता लेबिल नहीं लेवल है।

काशी में संगीत के समृद्ध इतिहास को देखते हुए वर्तमान स्थिति पर आपका क्या विचार है?
वर्तमान में संगीत में बाजारवाद हावी है विद्या जो चेतना का उत्कर्ष करती है वह पदार्थ से पूरी नहीं हो सकती। हमारा शिक्षक अकिंचन तो रहता था पर लेने वाली मुद्रा में नहीं पर देने वाली मुद्रा में। गांधी, मार्क्स जब तक श्रम का बदला श्रम न होगा तब तक विकास का क्रम नहीं होगा यह प्रक्रिया विनिमय से नहीं बल्कि तन्मय और समन्वय से चलेगी जिस प्रकार पूरे संसार को 100 बार बेचने के बाद भी आप माँ नहीं खरीद सकते इसी तरह संगीत भी है जो नाॅट फार सेल है। जब हम कीमत आरोपित करते है तो वस्तु तत्व में बदल जाता है। विद्या अनुकरण से नहीं संक्रमण से होती है। इसीलिये इसे रिले-रेस कहते हैं जो पुरानी पीढ़ी से अगली पीढ़ी में हस्तान्तरित होती है। आप इतिहास देख ले आचार्य और स्नातक में देश की संस्कृति को बदला है किसी भी राज्यतंत्र में स्नातकों के लिए प्रवेश वर्जित नहीं था। ऐसा आज प्रजातंत्र में भी नहीं है। वर्तमान में सब समाचार्य हो गया है। भाव का सम्वाद हो सकता है अनुवाद नहीं लोगों में सहानुभूति नहीं समानानुभूति होनी चाहिए। तब मानव-मानव एक होंगे। हर कला का यही हाल है पढ़ाने का पैसा क्यों लिया जाता है। आपको तो खुद ही छात्र के रूप में कच्चा माल मिल रहा है उसे प्रशिक्षित करो तनख्वाह तय करों और अपनी लागत निकाल लो पर यहां तो सब खुद चाहते है कि देश का युवा इधर-उधर भटके।

संगीत में फ्यूजन को आप किस प्रकार देखते है?
यह पूरी तरह से कन्फ्यूजन है। आप जींस पहनना चाहते है आप पहन लें। लेकिन फ्यूजन के नाम पर सैंडिल कान में लटका ले यह कहां तक सही है। पहले आप कन्क्लूजन, डिसीजन जाने तब फ्यूजन को जाने। फ्यूज का अर्थ क्या है? बल्ब अगर फ्यूज हो जाये तो चार बल्ब भी लगा दे तो रोशनी नहीं होगी। यह एक तरह से स्वाद बदलना है भोजन नहीं। यह मनोरंजन मात्र साधन का बदलाव है।

जल तरंग संगीत की मुख्य धारा से समाप्त क्यों हो रहा है ?
जल तरंग का उल्लेख वेदों में है यह प्रकृति प्रदत हवा, जल, ध्वनि के द्वारा झंकृत होता है। इसमें अलग-अलग प्यालों में पानी की मात्रा भरकर बजाया जाता है। वर्तमान में उस गुणवत्ता के प्याले नहीं बन रहे है। जिसे यह प्राचीन वाद्य समाप्त हो रहा है।

बनारस का अख्खड़पन बाजारवाद से कितना प्रभावित है?
बनारस पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करता है। यहां ऑब्जरवेशन ही नहीं है बल्कि अब्जारवेशन बनारस की मूल धारा में है यह अनन्त विद्या का केन्द्र चेतना को परिष्कृत करने वाला है। यह मृत्यु का प्रतिक्षालय नहीं मोक्ष की जननी है। यहां कोई आत्म प्रचार नहीं करता आत्म अभिव्यक्ति करता है। काशी के चार भाव है। गुप्त काशी, भोक्त काशी, सुप्त काशी और मुक्त काशी। काशी की गलियों को अनियंत्रित विकास कहा जाता है। जबकि पहले जानबूझकर रोड नहीं बनाये जाते थे। ऐसा इसलिए था कि कभी कोई हजार सैनिक भी आक्रमण करे तो गलियां इतनी पतली की चार से ज्यादा अंदर न घुस सके और उनके लिए चार आदमी तलवार गड़ासा लेकर खड़े रहे। यहां की गलिया अभेद्य किला है। जैसे हनुमान फाटक, सरस्वती फाटक, गणेश फाटक इत्यादि। दोष बहुत है पर गुण मिले तो उसे सजाकर रखिए इस दृष्टि से काशी सदैव थी, है और रहेगी।

नई पीढ़ी इन संस्कारों को छोड़कर बाजार की तरफ जा रही है यह कैसे बचेगी?
वर्तमान में संस्कृति सांकर्य चल रहा है। इसमें धारणाओं का निरसन होना चाहिए। हमें अपने सांस्कृतिक स्व व्यक्तित्व से परिचित होना होगा। हम पाश्चात्य का अनुकरण कर रहे है। रिक्शे वाले को 10 रु0 अधिक नहीं दे सकते पर बड़े होटल में घुसने पर सलाम करने वाले दरवान या बैरे को 50 रु0 देंगे और यह भी सोचेंगे कि कम तो नहीं दिया आज विश्वविद्यालय में पढ़नें वाले 99ः छात्रों को स्नातक का अर्थ नहीं पता है हम समस्या का रोना रो रहे है। पर उसका निराकरण नहीं कर रहे है। यह दुर्भाग्य है कि हाईस्कूल पास लड़का 24 लाख रुपये प्रतिवर्ष की तनख्वाह के लिए मालिक बन साक्षात्कार ले रहा है अखबार में खबर छपती है कि 1 करोड़ की हीरोइन पकड़ी गयी यह नहीं लिखा जाता है कि एक हजार आदमी का जीवन बच गया। हम सूट कल्चर, वीजनस डील को ग्रहण कर रहे हैं। मनुष्य का यंत्रीकरण हो रहा है भावनायें कमजोरी मानी जा रही है। नौजवान एक वाक्य में 10 अंग्रेजी के शब्द बोलना सम्मान समझता है। ऐसी भाषा कहां ले जायेगी। यह भाषा सांकर्य न उन्हें हिन्दी जानने देता है न ही अंग्रेजी। नौजवानों को मृग मरीचका के पीछे लगा रहे है। यहां का नौजवान पहले से ही ऊँचा है वह शिक्षित होके बर्बाद हो रहा है। भारतीय नौजवान का विकास के नाम पर विनाश हो रहा है। आज आदमी की पहचान, आदमी से नहीं उसके कार से हो रही है। आज सब कुछ पेट तक सीमित हो गया है रुपया इस कदर हावी है कि सेल्फ डेकोरेशन या सेल्फ इम्प्रोवाइजेशन क्या लेना है यह निर्णय नहीं कर पा रहा है। नौजवानों को बर्बाद कर रहे है और ऐसा क्यों हो रहा है का विश्लेषण कर रहे हैं। काशी सांस्कृतिक प्रतिनितिधत्व का कार्य कर रही है। जो काशी का होगा वह मूल आत्मा में ही रहेगा। पूरे भारत का निष्कर्ष यहां उत्कर्ष की पूजा करता है और उससे हर्ष पाता है।

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